Thursday, 22 February 2018

दिल्ली के मुख्य सचिव की आआपा के विधायकों द्वारा पिटाई - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

दिल्ली के मुख्य सचिव की पिटाई बेहद निंदनीय है और शर्मनाक भी। जो भी इस घटना में शामिल हों, उन्हें तत्काल हिरासत में ले कर उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिये। दिल्ली पुलिस ने कुछ गिरफ्तारियाँ की भी है। यह घटना दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उपस्थिति में हुयी है। यह और भी शर्मनाक है। अगर उनकी भी सहमति मुख्य सचिव से मार पीट करने में रही है तो उनके खिलाफ भी कार्यवाही की जाय।

लेकिन ऐसी स्थिति आयी ही क्यों ? यह भी पहलीं बार है कि चीफ सेक्रेटरी स्तर का कोई बड़ा अफसर पहली बार बदतमीज और गुंडे विधायकों के हांथो पिटा हो। लेकिन देश भर में अक्सर कहीं न कहीं, कभी न कभी, कोई न कोई, सरकारी विभागों के छोटे अफसर इन विधायकों के हांथो पिटते रहते हैं। यहां तक कि पुलिस भी। इस अराजक स्थिति पर कभी भी बड़े अधिकारियों के संगठन या संघो ने सरकार से मिल कर एतराज़ नहीं जताया है। फिरोजाबाद में एक पुलिस कप्तान को तत्कालीन सत्ताधारी दल के रसूखदार गुंडो ने पीटा, एक भी आवाज़ विरोध की नहीं उठी थी तब । जब राजनीतिक दलों में पार्टी के प्रमुख पर जिलाबदर और हत्याकांड में संदेही जैसे फ़र्ज़ी नेता काबिज़ होते रहेंगे तो यह स्थिति आनी ही है। अभी औऱ भयावह परिणामों के लिये तैयार रहिये।

अशोक खेमका हरियाणा कैडर के आईएएस अफसर हैं। उनका यह ट्वीट पढें,

IAS associations' support for Delhi Chief Secretary is an appreciable digression from usual stony silence. They should also speak up on more pressing national issues which affect general populace directly.
#AshokKhemka

अशोक जी का यह ट्वीट आईएएस एसोशिएसन की उस प्रतिक्रिया पर है जो इसने दिल्ली चीफ सेक्रेटरी की पिटाई पर , पिटाई के विरोध पर की गयी थी। अशोसिएसन की प्रतिक्रिया गलत नहीं है और हम सब उनकी प्रतिक्रिया के साथ हैं। पर क्या कभी आईएएस संघ ने अपनी अंतरात्मा नौकरशाही की हो रही दुर्गति पर भी टटोली है ? विभिन्न विभागों के अफसर सरकारी काम काज के दौरान नेताओं और गुर्गों के हांथो पिटते रहे हैं पर कभी यह व्यथा सरकार तक इस शीर्ष नौकरशाही के संघ ने पहुंचायी है ? नौकरशाही संविधान और नियम कानूनों के प्रति प्रतिबद्ध है न कि किसी व्यक्ति के प्रति।  आभिजात्य परम्परा और स्टील फ्रेम के अतीत मोह की पिनक में पड़े पड़े नौकरशाही का यह सिरमौर तन्त्र कब जंग से कबाड़ की ओर अग्रसर हो गया पता ही नहीं चला। कभी किसी भी सरकारी सेवा संघ ( में ट्रेड यूनियन की बात नहीं कर रहा हूँ ) ने अपने कैडर के उन अफसरों का मुद्दा उठाया है जो केवल अपनी नियमों के प्रति प्रतिबद्धता के कारण राजनीतिक आकाओं को रास नहीं आते हैं और उनका उत्पीड़न झेलते हुए अस्पृश्य हो जाते हैं ? महीनों नहीं सालों तक निलंबित या उपेक्षित जिसे हम पनिशमेंट पोस्टिंग के नाम से जानते हैं , पर पड़े हुये समय काटते रहते हैं। यह बात केवल आईएएस संघ की ही नहीं है बल्कि पुलिस में तो और भी हैं। जहां तक अधीनस्थ पुलिस सेवा की बात है वहां तो स्थिति भयावह है। आईएएस सेवा संघ को देश की नौकरशाही का सिरमौर होने के कारण, नौकरशाही में घुस रही बेमतलब की राजनीतिक दखलंदाज़ी और राजनीतिक व्यक्तियों की गुंडागर्दी के खिलाफ खुल कर आवाज़ उठानी चाहिये और सरकार को यह व्यथा बतानी भी चाहिये। नहीं तो नौकरशाही का काम करना मुश्किल हो जाएगा।

इस लघुलेख के फेसबुक पर पोस्ट होने के बाद जो कमेंट्स प्राप्त हुये,  उनमें मेरे मित्र और पूर्व आईएएस अधिकारी हरिकांत त्रिपाठी जी का यह कमेंट प्राप्त हुआ। मैं इस अच्छी टिप्पणी को इस लेख के साथ जोड़ रहा हूँ। हरिकांत जी ने कम शब्दों और बेहद प्रभावोत्पादक शैली में नौकरशाही के रोग की पहचान कर ली है ।

" व्यवस्था टूटकर ध्वस्त हो जाने के कगार पर पहुँच रही है और मुख्य सचिव का पिटना और वह भी मुख्य मंत्री के घर पर उनकी उपस्थिति में पिट जाना व्यवस्था के पतनोन्मुख होने के अनेक लक्षणों में से मात्र एक लक्षण है |
            राजनीतिज्ञों का सरकारी सेवकों से संविधानेत्तर अपेक्षायें रखना और सरकारी सेवकों का तुच्छ फायदे के लिए झुकने की अपेक्षा पर साष्टांग दण्डवत् मुद्रा में आने को तैयार रहना इस बीमारी का मूल कारण है | जो स्वभावतः व्यवस्था विरोधी हैं या ध्वस्तमान व्यवस्था में अपना स्वार्थी मक़सद हासिल करना आसान पाते हैं उन्हें इससे खुश होना स्वाभाविक है और वे अपने मूढ़तापूर्ण तर्क से इसे नजरअंदाज करने अखवा सही साबित करने की कोशिश करेंगे ही पर आमजन जो देश में सफल और जनहित वाली लोक व्यवस्था को बचाना /बनाना चाहते हैं उन्हें निरन्तर संघर्ष कर इस पतनशीलता का मुँह मोड़ देना होगा | "

मैं हरिकांत जी के इस टिप्पणी से पूरी तरह सहमत हूँ।

© विजय शंकर सिंह

बीएचयू में गोडसे - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में गोडसे पर एक नाटक हुआ है और उस नाटक में गांधी हत्या का औचित्य साबित किया गया है। ऐसे नाटकों के मंचन के रोके जाने के पक्ष में मैं नहीं हूं। क्यों कि गोडसे ने जिस महामानव की हत्या की थी, उसके विचार ऐसे हज़ारों नाटक मंचन कर के खत्म नहीं कर सकते हैं। यह वही मधुर मनोहर अतीव सुंदर परिसर है जहां 1916 की वसन्त पंचमी के दिन, महात्मा गांधी एक विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। आज एक सदी के बाद जब उनके हत्यारे के कृत्य का मंचन हुआ और जब इस पर बीएचयू के डीन ऑफ स्टूडेंट्स से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हमे सभी महापुरुषों को याद करना चाहिये। तो महामना के परिसर में गोडसे को याद किया गया । गोडसे एक रोल मॉडल हैं।

रोल मॉडल के अभाव में उन्हें तलाश एक रोल मॉडल की हैं। इसी लिये कभी गोडसे में, कभी शम्भू रैगर में तो कभी किसी न किसी अपराधी में वे रोल मॉडल ढूंढ रहे हैं। रोल मॉडल की तलाश कचरे के डिब्बे में हो रही है। कचरा यानी इतिहास का उच्छिष्ट। इतिहास जिन्हें झटक कर फेंक चुका है। डस्टबिन में गंधाते कचरे के ढेर में जब कभी बहुत उत्कंठित होते हैं उतर कर अपने रोल मॉडल खोजने लगते हैं। कभी कभी अचानक भगत सिंह से वे प्यार करने लगते हैं। पर जब घुसते हैं उस शहीद ए आज़म के जेहन में तो बिलबिला कर बाहर निकल आते हैं। वो ताब और वो आग जो भगत सिंह में सिमटी हैं उसे ये कहाँ सह पाएंगे।

फिर इनकी तलाश खत्म होती है सुभाष बाबू पर। पर जैसे ही इन्हें पता चलता है कि सुभाष तो वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है। उनके द्वारा गठित राजनीतिक दल फॉरवर्ड ब्लॉक दरअसल कांग्रेस के समाजवादी आंदोलन का एक हिस्सा था। बस जहां लाल परचम दिखा, बिदकना शुरू।

फिर ये पकड़ते हैं सरदार पटेल को। लेकिन सरदार तो सरदार थे। वे नेहरू तो थे नहीं। लौह इच्छा शक्ति और स्पष्ट चिंतन वाले। उन्होंने आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया और गोलवलकर को जो चिट्ठी लिखी वह आज तक इनके विचारक राकेश सिन्हा को अपच किये हुये है। पटेल तो इन्हें इस लिये पसंद थे कि, उनका नेहरू से कुछ मामलों में मतभेद था। इसीलिए अब भी वे पटेल के साथ भी ये कभी नीम नीम कभी शहद शहद जैसे ताल्लुकात रखते हैं।

अब कहाँ से लाएं ये रोल मॉडल। हेगड़ेवार और गोलवलकर ज़रूर हैं। पर उनके बारे में कुछ बोलते भी नहीं। न तो बंच ऑफ थॉट जिसका हिंदी अनुवाद विचार नवनीत है, के बारे में और न ही 1940 से ले कर 46 तक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जिन्ना से यारी, और अंग्रेज़ों से दोस्ती के बारे में। फिर क्या करें ।

रोल मॉडल भी इन्हें गांधी का विरोधी चाहिये। गाँधी के सिद्धांतों का खूब विरोध हुआ है। वे मुझे भी काल्पनिक आदर्शवाद की तरह लगते हैं। वे यूटोपिया हैं। पर इन सब के लिये उन्हें गांधी का जीवन और दर्शन पढ़ना पड़ेगा। पर जब पढ़ने से बैर हो तो क्या किया जाय। जब किसी के विचार भयभीत करने लगें और जब उन विचारों की कोई तार्किक काट न हो तो, उसी आदमी को ही काट दो, जिसके विचार से भयाक्रांत हो। फिर गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी। और एक नया रोल मॉडल मिल गया, नाथूराम गोडसे।

लेकिन जैसे ही कहिये कि गोडसे आरएसएस का था, तो तपाक से डिनायल मोड़ में आ जाएंगे कि वह तो हमारा नहीं था, हमने उसे निकाल दिया था। हद यह है कि राकेश सिन्हा ने टीवी डिबेट पर यह तक कह दिया कि वे बंच ऑफ थॉट जो संघ की गीता कही जाती है, को भी नकार दिया। यह गैरजिम्मेदारी की पराकाष्ठा है। अब वे गोडसे की मैंने गांधी वध क्यों किया को पढ़ रहे हैं, तालियां बजा रहे हैं, कुर्सियों पर महामना के प्रांगड़ में उछल रहे हैं। अपनी चचेरी बहन के बलात्कारी शम्भू रैगर में धर्म ध्वजा ढूंढ रहे हैं। यह कौन सी संस्कृति है, यह तो वही जानें।

© विजय शंकर सिंह

Friday, 9 February 2018

नेहरू को छोड़ कर, थोड़ा वर्तमान में भी झांकिये सरकार / विजय शंकर सिंह

सरकार को अगर नेहरू के अध्ययन से फुरसत मिल गयी हो तो थोड़ा सीमा और देश के अंदरुनी हालात पर भी देख लें ।

* डोकलां में सड़क और पुख्ता कैम्प बनाने के बाद चीन ने वहां आगे बढ़ कर और टेंट लगा लिये हैं।

* मालदीव में आंतरिक उथल पुथल है और भारत की उदासीनता के कारण चीन वहां अपनी पकड़ मजबूत बना रहा है।

* श्रीलंका में भी उसके नौसैनिक अड्डे बन रहे हैं।

* नेपाल तो हमसे रूठ ही गया है। वह अब खुद को चीन के अधिक निकट पा रहा है। यह भी पहली बार ही है कि नेपाल और चीन दोनों ही साझा सैन्य अभ्यास कर रहे हैं।

* पाकिस्तान तो कमोबेश उसका एक उपनिवेश बन ही रहा है।

* कश्मीर में सेना के कैम्प पर आज फिर हमला हुआ है और 2014 से अब तक पूर्ववर्ती कालों की तुलना में बाद सबसे अधिक सैनिकों को दुश्मन देश ने मारा है। नागरिक भी मरे हैं। यह भी सही है कि आतंकी भी मरे हैं। पर खुद को शहीद कर के दुश्मन को मारना कोई अच्छी सैन्य रणनीति नहीं मानी जाती। दुश्मन का अधिक से अधिक और अपना कम से कम नुक़सान हो यही मान्य और स्थापित सैन्य नीति रही है।

* सरकार और सरकार के समर्थक मानें या न माने, चाहे मामला आर्थिक नीति का हो, या सीमा तनाव का, या विदेश नीति का या आंतरिक सुरक्षा का, या संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान और गरिमा का हर तरफ से संकेत उतने उत्साहवर्धक नहीं हैं जितने 2014 में सरकार से उम्मीदें थीं और जितने सुनहरे सपने दिखाए गए थे।

कश्मीर और चीन की समस्या के लिये अक्सर नेहरू को दोषी माना जाता है। बिना किसी बहस में पड़े और नेहरू के बचाव में एक भी शब्द न कहते हुये, उन पर लगा यह आरोप स्वीकार भी कर लिया जाय तो भी, मेरा यह कहना है कि उस लकीर को पीटने से क्या लाभ जो अब अतीत बन गया है। सरकार नेहरू का पुनर्मूल्यांकन या जांच कमेटी या इतिहास लेखन के लिये नहीं चुनी गयी है बल्कि उन समस्याओं के निदान के लिये बनी है जो हमारे सामने है। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता है। कोई भी शासक त्रुटिहीन नही होता है। नेहरू भी अपवाद नहीं थे।

9 फरवरी की रात कहते हैं कि अफजल गुरु जो कश्मीरी आतंकी था का एक जश्न मनाया जा रहा था। यह भी कहा गया कि उस दिन ' भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह का नारा भी कुछ लोगों ने लगाया था। बहुत शोर मचा था। पूरा विश्वविद्यालय ही देशद्रोही करार दे दिया गया । यह नारा सच मे देशद्रोही था , है और रहेगा। तीन छात्र गिरफ्तार किये गये। कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान। उनकी गिरफ्तारी भी हुयी। देशद्रोह का मुक़दमा भी चला। अब तीनों जमानत पर है। मुक़दमा अभी भी जेरे तफ़्तीश है। घटना की वीडियो है। गवाह भी हैं। मुल्ज़िम भी है। पर आज तक चार्जशीट पुलिस दाखिल नहीं कर पायी। क्यों ? यह सरकार जाने।

पंद्रह बीस दिन पहले एक टीवी चैनल पर डिबेट के दौरान कश्मीर के दूसरे बड़े मुफ़्ती ने खुले आम देश के बंटवारे की मांग धार्मिक आधार पर की, खूब बावेला मचा पर कश्मीर और देश मे एक ही दल भाजपा की सरकार रहते हुये भी मुफ़्ती के खिलाफ न तो कोई कार्यवाही हुयी और न ही कोई मुक़दमा कायम किया गया।
यह कैसी देशभक्ति है मित्रों ?

रहा सवाल #जवाहरलाल_नेहरू का तो उनकी कितनी भी आलोचना कर ले अब उनका तो कुछ बनना बिगड़ना नहीं है। उल्टे 2014 के बाद उनकी किताबों की बिक्री विशेषकर Discovery Of India की, दसगुना अधिक बढ़ गयी है। उनका पाठक वर्ग जितना भारत मे नहीं है उससे कहीं अधिक पश्चिमी देशों में है। नेहरू पर इस चर्चा से एक बदलाव यह भी आया है कि जो कभी नेहरू इंदिरा के नीतियों के आलोचक थे वे भी अब उन्हें कभी कभी सराहने लगे हैं। क्यों कि मूल्यांकन सदैव सापेक्ष होता है। आइंस्टीन वास्तविक विज्ञान में ही नहीं बल्कि समाज विज्ञान के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं !

© विजय शंकर सिंह

रघुवीर सहाय की एक कविता - हंसो हंसो जल्दी हंसो / विजय

हंसी पर यह कविता बहुत कुछ कह देती है। रघुवीर सहाय , नयी कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर रहे है। अब इसे किसी के मान - अपमान गरिमा - गाथा से जोड़ कर लाठी न भांजने लगियेगा। गरिमा को स्वतःस्फूर्त भाव से जगने दीजिये । उसे ज़िद, और मार्केटिंग द्वारा नहीं पाया जा सकता है।
रघुवीर सहाय की यह कविता पढें।
***
हँसो हँसो जल्दी हँसो

हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही जा रही है

हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी
और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो
वरना शक होगा कि यह शख़्स शर्म में शामिल नहीं
और मारे जाओगे

हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो
सब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकर
एक अपनापे की हँसी हँसते हो
जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाए

जितनी देर ऊँचा गोल गुंबद गूँजता रहे, उतनी देर
तुम बोल सकते हो अपने से
गूँज थमते थमते फिर हँसना
क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फँसे
अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे

हँसो पर चुटकलों से बचो
उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हो जो किसी ने सौ साल साल पहले दिए हों

बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे
और ऐसे मौकों पर हँसो
जो कि अनिवार्य हों
जैसे ग़रीब पर किसी ताक़तवर की मार
जहाँ कोई कुछ कर नहीं सकता
उस ग़रीब के सिवाय
और वह भी अकसर हँसता है

हँसो हँसो जल्दी हँसो
इसके पहले कि वह चले जाएँ
उनसे हाथ मिलाते हुए
नज़रें नीची किए
उसको याद दिलाते हुए हँसो
कि तुम कल भी हँसे थे !
***
#vss

Wednesday, 7 February 2018

केदारनाथ सिंह की एक कविता - बसंत / विजय शंकर सिंह

बसंत पर केदारनाथ सिंह की एक कविता पढें ~
***
बसंत 

और बसंत फिर आ रहा है
शाकुंतल का एक पन्ना
मेरी अलमारी से निकलकर
हवा में फरफरा रहा है
फरफरा रहा है कि मैं उठूँ
और आस-पास फैली हुई चीजों के कानों में
कह दूँ 'ना'
एक दृढ़
और छोटी-सी 'ना'
जो सारी आवाजों के विरुद्ध
मेरी छाती में सुरक्षित है

मैं उठता हूँ
दरवाजे तक जाता हूँ
शहर को देखता हूँ
हिलाता हूँ हाथ
और जोर से चिल्लाता हूँ-
ना...ना...ना

मैं हैरान हूँ
मैंने कितने बरस गँवा दिए
पटरी से चलते हुए
और दुनिया से कहते हुए
हाँ हाँ हाँ...

( केदारनाथ सिंह  )
***
#vss

Monday, 5 February 2018

Kakistocracy, काकिस्टोक्रेसी या मूढ़तन्त्र - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह

अनेक शासन पद्धतियों के बीच एक अल्पज्ञात शासन पद्धति है काकिस्टोक्रेसी, Kakistocracy . इसका अर्थ है, सरकार की एक ऐसी प्रणाली, जो सबसे खराब, कम से कम योग्य या सबसे बेईमान नागरिकों द्वारा संचालित की जाती है। इसे कोई शासन प्रणाली नहीं कही जानी चाहिये बल्कि इसे किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के एक ग्रहण काल की तरह कहा जा सकता है जब हम निकम्मे लोगों द्वारा शासित हो रहे हों तब। यह शब्द 17 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इस्तेमाल किया गया जब फ्रांस का लोकतंत्र और इंगलेंड का शासन गड़बड़ाने लगा था। इंग्लैंड ने तो अपनी समृद्ध लोकतांत्रिक परम्परा के कारण  खुद को संभाल लिया था पर फ्रांस ख़ुद को संभाल नहीं पाया था। तब अयोग्य और भ्रष्ट लोगों द्वारा शासित होने के कारण , 1829 में यह शब्द एक अंग्रेजी लेखक द्वारा इस्तेमाल किया गया था। मैने अपनी समझ से इसका हिंदी नाम मूढ़तन्त्र रखा है। मुझे शब्दकोश में इसका शाब्दिक अर्थ नहीं मिला।

इस का शाब्दिक अर्थ यूनानी शब्द काकिस्टोस जिसका मतलब ' सबसे खराब ' होता है और क्रेटोस यानी ' नियम ' , को मिला कर बनता है, सबसे खराब विधान । ग्रीक परम्परा से आया यह शब्द पहली बार अंग्रेजी में इस्तेमाल किया गया था, फिर राजनीति शास्त्र के विचारकों ने इसे अन्य भाषाओं में भी रूपांतरित कर दिया ।

राजनीतिशास्त्र के अनुसार इस की अकादमिक परिभाषा इस प्रकार है ~

A "kakistocracy" is a system of government which is run by the worst, least qualified, or most unscrupulous citizens.

काकिस्टोक्रेसी, शासन की एक ऐसी प्रणाली है जो सबसे बुरे, सबसे कम शिक्षित और सबसे निर्लज्ज लोगों द्वारा संचालित की जाती है ।

यह कोई मान्य शासन प्रणाली नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र का ही एक विकृत रूप है । लोकतंत्र जब अपनी पटरी से उतरने  लगता है और शासन तंत्र में कम पढ़े लिखे और अयोग्य लोग आने  लगते हैं तो व्यवस्था का क्षरण होंने लगता है। उस अधोगामी व्यवस्था को नाम दिया गया काकिस्टोक्रेसी । लोकतंत्र में सत्ता की सारी ताक़त जनता में निहित है। जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है और वे चुने हुये प्रतिनिधि एक संविधान के अंतर्गत देश का शासन चलाते हैं। शासन को सुविधानुसार चलाने के लिये प्रशासनिक तंत्र गठित किया जाता है जो ब्यूरोक्रेसी के रूप में जाना जाता है। ब्यूरोक्रेसी, सभी प्रशासनिक तंत्र के लिये सम्बोधित किया जाने वाला शब्द है। जिसने पुलिस, प्रशासन, कर प्रशासन आदि आदि सभी तंत्र सम्मिलित होते हैं। इसी को संविधान में कार्यपालिका यानी एक्ज़ीक्यूटिव कहा गया है। ब्यूरोक्रेसी मूलतः सरकार यानी चुने हुये प्रतिनिधियों के मंत्रिमंडल के अधीन उसके दिशा निर्देशों के अनुसार काम करती है। पर ब्यूरोक्रेसी उस मन्त्रिमण्डल का दास नहीं होती है और न ही उनके हर आदेश और निर्देश मानने के लिये बाध्य ही होती है । ब्यूरोक्रेसी का कौन सा तंत्र कैसे और किस प्रक्रिया यानी प्रोसीजर और विधान यानी नियमों उपनियमों के अधीन काम करती है , यह सब संहिताबद्ध है। नौकरशाही से उन्हीं संहिताओं का पालन करने की अपेक्षा की जाती है । पर यहीं पर जब ब्यूरोक्रेसी कमज़ोर पड़ती है या स्वार्थवश मंत्रिमंडल के हर काम को दासभाव से स्वीकार कर नतमस्तक होने लगती है तो प्रशासन पर इसका बुरा असर पड़ता है और एक अच्छी खासी व्यवस्था पटरी से उतरने लगती है । ऐसी दशा में चुने हुये प्रतिनिधियों की क्षमता, मेधा और इच्छाशक्ति पर यह निर्भर करता है कि वे कैसे इस गिरावट को नियंत्रित करते हैं। अगर सरकार का राजनैतिक नेतृत्व प्रतिभावान और योग्य नेताओं का हुआ तो वे ब्यूरोक्रेसी को वे कुशलता से नियंत्रित भी कर लेते हैं अन्यथा ब्यूरोक्रेसी बेलगाम हो जाती है और फिर तो दुर्गति होनी ही है। इसी समय राजनैतिक नेतृत्व से परिपक्वता और दूरदर्शिता की अपेक्षा होती है। इसे ही अंग्रेज़ी में स्टेट्समैनशिप कहते हैं।

लोकतंत्र में जनता का यह सर्वोच्च दायित्व है कि वह जब भी चुने अच्छे और योग्य लोगों को ही चुने और न ही सिर्फ उन्हें चुने बल्कि उन पर नियंत्रण भी रखे। यह नियंत्रण, अगर चुने हुये प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का कोई प्राविधान संविधान में नहीं है तो, वह मीडिया, स्थानीय प्रतिनिधि पर दबाव, आंदोलन आदि के द्वारा ही रखा जा सकता है और दुनिया भर में जहाँ जहाँ लोकशाही है, जनता अक्सर इन उपायों से अपनी व्यथा और नाराज़गी व्यक्त करते हुये नियंत्रण रखती भी है। इसी लिये दुनिया भर में जहां जहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है वहां वहां के संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है। जनता का यह दायित्व और कर्तव्य भी है कि वह निरन्तर इस अधिकार के प्रति सजग और जागरूक बनी रहे और जिन उम्मीदों से उसने सरकार चुनी है उसे जब भी पूरी होते न देखे तो निडर हो कर आवाज़ उठाये । इसी लिये लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को पर्याप्त महत्व दिया है और विरोध कोई हंगामा करने वाले अराजक लोगों का गिरोह नहीं है वह सरकार को जागरूक करने उसे पटरी पर बनाये रखने के उद्देश्य से अवधारित किया गया है । यह बात अलग है कि इसे देशद्रोही कह कर सम्बोधित करने का फैशन हो गया है।

लोकतंत्र तभी तक मज़बूत है जब तक जनता अपने मतदान के अधिकार के प्रति सचेत है और सरकार चुनने के बाद भी इस बात पर सचेत रहे कि चुने हुये प्रतिनिधि उसके लिये, उसके द्वारा  चुने गए हैं। पर हम चुन तो लेते हैं पर चुनने के बाद सरकार को ही माई बाप मानते हुये उसके हर कदम का दुंदुभिवादन करने लगते हैं । यही ठकुरसुहाती भरा दासभाव लोकतंत्र को क्षरित करता है और ऐसे ही लोकतंत्र फिर, धीरे धीरे मूढ़तन्त्र में बदलने लगता है।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 4 February 2018

ऑनर किलिंग या सम्मान हत्यायें और बीमार बनता समाज - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

अंकित की हत्या उसी मानसिकता का परिणाम है जिस ने देश की आबोहवा खराब कर रखी है। यह आबोहवा है धर्म के कट्टरता की, धर्म से जुड़े मिथ्याभिमान की, धर्म के मध्ययुगीन आक्रामक सोच की, जाति और नस्ल के श्रेष्ठता के भ्रम की । अंकित दिल्ली का एक फोटोग्राफर था। वह एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था। धर्म के फैलते ज़हर से संक्रमित मस्तिष्क ने उस अंकित की हत्या कर दी। हत्या का कारण जो बताया गया वह ऑनर किलिंग यानी ' सम्मान बचाने के लिये हत्या ' थी। किसका सम्मान इस हत्या से बढ़ा है ?हत्यारे का ? अंकित का ? अंकित की प्रेमिका का ? समाज का ? हत्यारे के धर्म, इस्लाम का ? या ईश्वर, अल्लाह आदि अनदेखे उस अस्तित्व का जिसके सम्मान और नाम पर हम घृणित से घृणित कुकर्म करने के लिये तत्पर हो जाते हैं ? संसार मे धर्म या पंथ या सम्प्रदाय जो भी कह लीजिये और ईश्वर, अल्लाह, गॉड जिस भी भाषा मे तर्जुमा कर के पढ़ लीजिये ,के नाम और एक अनदेखे जन्नत की उम्मीद पर जितनी हिंसा, बर्बरता, और निर्दोषों के खून हमने बहाए हैं उतने तो किसी और कारण से कभी नहीं बहाए हैं। ढाई आखर का शब्द प्रेम की पैरवी करते धर्म और धर्म से जुड़े लोग कभी नहीं थकते पर जैसे ही यह व्यवहार में दिख जाता है तो लोग खुद ही इसके विरुध्द खड़े हो जाते हैं। जहाँ सजातीय प्रेम विवाह पर भी लोग नाक भौं सिकोड़ते दिख जाँय वहां अंतरजातीय और अंतर्धार्मिक विवाह तो आत्मघात ही लगेगा।

लेकिन अन्तर्धामिक विवाह और प्रेम भरतीय समाज मे नए नहीं है। पर यह सभी तबके में स्वीकार्य भी नहीं है। अत्यंत उच्च वर्ग में जो धन संपदा से समृद्ध हैं में यह कभी भी कोई समस्या नहीं रहे है। आप सिने जगत को देखिये। वहां यह कोई समस्या ही नहीं है। वहां के समाज से इस प्रेम और विवाह को स्वीकार कर लिया है। हिन्दू अभिनेताओं की मुस्लिम अभिनेत्रियों से और मुस्लिम अभिनेताओं की हिन्दू अभिनेत्रियों से खूब विवाह हुये हैं और आज भी हो रहे हैं। पर समाज के अपेक्षाकृत निचले पायदान पर खड़े समाज के लोगो के मन ने धर्म और जाति के मिथ्या अहंकार का संक्रमण अधिक होता है। वे इस ग्रन्थि से सदैव आशंकित और पीड़ित रहते हैं कि लोग उनके बारे में क्या कहेंगे , क्या सोचेंगे, आदि आदि। जब यही भाव हद से अधिक बढ़ जाता है तो वह अपराध का प्रेरक भाव या मोटिव हो जाता है। यह मोटिव दो धर्मों के बीच ही नहीं है बल्कि दो जातियों के बीच भी है। ऑनर किलिंग के कई उदाहरण अंतरजातीय विवाहों के संदर्भ में भी बहुतायत से हैं।

यह हत्यायें इस धारणा का परिणाम हैं कि कोई भी व्यक्ति जिसके किसी कृत्य के कारण यदि उसके कुल या समुदाय या जाति या धर्म का अपमान होता है तो उस कुल या समुदाय या जाति या धर्म  के सम्मान की रक्षा के लिए उस व्यक्ति विशेष की हत्या जायज़ है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (#यूएनएफपीए) का अनुमान है कि, दुनिया भर में सालाना 5000 के लगभग हत्यायें, सम्मान हत्यायें होती है। मानव अधिकार संस्था ह्यूमन रॉइट्स वॉच, सम्मान हत्या को निम्न रूप में परिभाषित करती है:

“सम्मान की रक्षा के लिये किये गये अपराध, हिंसा के वो मामले हैं, जिन्हें परिवार के पुरुष सदस्यों ने अपने ही परिवार की महिलाओं के खिलाफ इसलिये अंजाम दिया है, क्योंकि उनके अनुसार उस महिला सदस्य के किसी कृत्य से समूचे परिवार की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंची है। इसका कारण कुछ भी हो सकता है जैसे कि: परिवार द्वारा नियत शादी करने से इंकार, किसी यौन अपराध का शिकार बनना, पति से (प्रताड़ना देने वाले पति से भी) तलाक की मांग करना या फिर अवैध संबंध रखने का संदेह। केवल यह धारणा ही उस महिला सदस्य पर हमले को उचित ठहराने के लिये पर्याप्त है कि उसके किसी कदम से परिवार की इज्जत को बट्टा लगा है।”

अक्सर हम अपराध और हत्याओं को हम सापेक्ष भाव से देखते है। एक हत्या हमे विचलित करती है तो ऐसी ही ऐसे ही कारणों से की गयी एक अन्य हत्या हमे कहीं न कहीं कभी न कभी तोष प्रदान करती है। कभी हत्यारे का हम महिमामंडित कर उसमें हम अपना रोल मॉडल खोजने लगते है तो कभी वैसे ही हत्या के अपराधी को हम फांसी देने और गोली मार देने  की मांग करने लगते हैं। अपराध और हत्या को भी सुविधा भाव से देखने की यह प्रवित्ति एक बीमार समाज की पहचान है। यह व्याधि बीमार समाज को और अधिक संकीर्ण बनाएगी। हत्या , हत्या है। यह भारतीय दंड विधान का सबसे नृशंस अपराध है। पुलिस हत्या के हर अपराध को इसी दृष्टिकोण से देखती है और अपना प्रोफेशनल दायित्व निभाती है । लेकिन धर्म और जाति के कठघरे में जैसे जैसे समाज बंटता जाएगा, लोग मानसिक रूप से अलग थलग पड़ते जाएंगे वैसे वैसे हम रुग्ण समाज मे बदलते जाएंगे। पुलिस के पास इसका कोई इलाज नहीं है। पुलिस भी उसी समाज से आती है जो समाज इस बुराई से रूबरू हो रहा है।

अंकित की हत्या बहुत ही नृशंस भाव से की गयी है। हत्या के तरीके से हत्यारे की मनोदशा, प्रतिशोध भाव और हत्या का कारण जाना जा सकता है। जैसी बीभत्स फ़ोटो सोशल मीडिया पर तैर रही हैं, उस से हमलावर की दरिंदगी साफ जाहिर है। पुलिस ने हमलावरों को पकड़ लिया है और अब यह देखना है कि सभी सुबूत एकत्र कर अदालत के सामने रखे जाँय ताकि कड़ी से कड़ी सजा दी जा सके। अंकित की बर्बर हत्या एक बीमार समाज की पहचान है। पुलिस ऐसी हत्याओं को रोक भी नहीं सकती है बस हत्यारे पकड़ कर सज़ा भले दिला दे । समाज को खुद ही इस व्याधि से मुक्त होना होगा।

© विजय शंकर सिंह