Monday, 20 November 2017

20 नवम्बर , पुण्यतिथि, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - एक स्मरण / विजय शंकर सिंह

आज फ़ैज़ साहब की पुण्य तिथि है। फ़ैज़ उर्दू के महानतम शायरों में से एक गिने जाते है । वे प्रगतिशील विचारों और मेहनतकश अवाम के स्वर थे। पत्रकार विनोद दुआ, फ़ैज़ साहब के बारे में अपने एक लेख में लिखते हैं, 

" बंटवारे के बाद फ़ैज़ पाकिस्तान चले गए. नाइंसाफी, शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ मुखरता से लिखने वाले शायर के रूप में मक़बूल हुए फ़ैज़ को अपने लेखन के लिए जेल जाना पड़ा. उन पर चौधरी लियाक़त अली ख़ान का तख़्ता पलटने की साज़िश करने के आरोप लगे.

उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और वे करीब पांच साल जेल में रहे. जेल में रहने के दौरान तमाम नायाब रचनाओं को शक्ल दी जो उनके दो संग्रहों ‘ज़िंदानामा’ और ‘दस्ते-सबा में दर्ज हैं. 1977 में तख़्तापलट हुआ तो उन्हें कई बरसों के लिए मुल्क़ से बेदख़ल कर दिया गया. 

1978 से लेकर 1982 तक का दौर उन्होंने निर्वासन में गुज़ारा. हालांकि, फ़ैज़ ने अपने तेवर और विचारों से कभी समझौता न करते हुए कविता के इतिहास को बदल कर रख दिया । "

अपने काव्य विकास की यात्रा के बारे में बताते एक बार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने कहा था कि,  

" श्रमिक आन्दोलनों और प्रगतिशील साहित्य आन्दोलन से जुड़कर उन्होंने सीखा कि अपनी ज़ात को बाकी दुनिया से अलग करके सोचना अव्वल तो मुमकिन ही नहीं, इसलिए कि इसमें बहरहाल गर्दो-पेश के सभी तजुर्बात शामिल होते हैं और अगर ऐसा मुमकिन हो भी तो इंतहाई गैर सूदमंद फेल है कि इनसानी फर्द की ज़ात अपनी सब मुहब्बतों और कुदरतों, मुसर्रतों और रंजिशों के बावजूद, बहुत ही छोटी सी, बहुत ही महदूद और हकीर शै है। इसकी वुसअत और पहनाई का पैमाना तो बाकी आलमे मौजूदात से उसके ज़हनी और जज्बाती रिश्ते हैं, खास तौर से इनसानी बिरादरी के मुश्तरका दुख-दर्द के रिश्ते। चुनांचे गमे जानां और गमे दौरां तो एक ही तजुर्बे के दो पहलू हैं। "

आशावाद उनकी कविता का केन्द्रीय स्वर है। कविताओं के ताने-बाने में, उसकी पृष्ठभूमि में वह मौजूद रहता है। जीवन के सभी कष्टों को इसके सहारे ही हल्का करते हैं। वे दु:ख और निराशा को अस्थायी मानते हैं और जीवन में भरोसा करते हैं। जेल जीवन की सघन पीड़ा को भी उन्होंने यह समझकर सह लिया। यह आशावाद उनको जीवनी शक्ति प्रदान करता है। उनका आशावाद हवाई-लफ्फाज़ी पर नहीं, बल्कि ठोस जमीन पर है। जन संघर्षों की जमीन से जुड़ा यह आशावाद एक शासन सत्ताओं की दहशत को, उनके खौफ को चाक-चाक कर देता है। उन्होंने अपने वतन में बार-बार बर्बर व दमनकारी फौजी शासन को देखा और जनता की आजादी व स्वाभिमान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छीनते देखा। उनका आशावाद यथार्थ की जमीन को नहीं छोड़ता।

निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नजऱ चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले ।

यह गज़ल सुनिये, आबिदा परवीन के सूफियाना स्वर में , 

शामे-फिराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गयी
दिल था कि फिर बहल गया, जां थी कि फिर सम्हल गयी

बज़्मे-खयाल में तेरे हुस्न की शमा जल गयी
दर्द का चंद बुझ गया, हिज्र की रात ढल गयी

जब तुझे याद कर लिया, सुबह महक-महक उठी
जब तेरा ग़म जगा लिया, रात मचल-मचल गयी

दिल से तो हर मुआमला करके चले थे साफ हम
कहने में उनके सामने, बात बदल बदल गयी

आखिरे-शब के हमसफर, फ़ैज़ न जाने क्या हुए
रह गयी किस जगह सबा, सुबह किधर निकल गयी
--फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ।

https://youtu.be/2iuNXQlZrUU

© विजय शंकर सिंह 


पद्मिनी लोक नायिका है, जातीय गौरव नहीं - जयराम शुक्ल का एक लेख / विजय शंकर सिंह

पद्मावती विवाद पर जयराम शुक्ल जी का यह लेख पढ़ें ।  यह लेख अकादमिक दृष्टिकोण से लिखा गया है , न कि भावना से संक्रमित हो कर ।
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पद्मिनी लोकनायिका हैं जातीय गौरव नहीं
साँच कहै ता..
~ जयराम शुक्ल

बात पद्मावती से शुरू हुई थी। बहस होनी थी कि भंसाली ने अपना कलाधर्म किस तरह निभाया। जायसी के पद्मावत की आत्मा बची है या रूपांतरित हो गयी। ऐतिहासिक लोकचरित्रों उसके कलारूपों के विस्तार की कितनी संभावनाएं हैं। पर बात मुड़ गई इतिहास के कब्रिस्तान की ओर। गड़े मुर्दे उखड़ने लगे।ढँकी मुदी बातें खुलने लगीं। जातीय अस्मिता का झंझावात उठ खड़ा हुआ। उसमें राजनीति शामिल हो गई। सोशलमीडिया के मसखरे चिंतातुर हो उठे। पक्ष-विपक्ष और तीसरा पक्ष भी ताल ठोककर खड़ा हो गया। किसी के लिए सांस्कृतिक आतंकवाद का खतरा मड़राने लगा। चैनलों के पैनलिए आँकलन लगाने लगे कि आसन्न चुनाव में किसका नफा किसका नुकसान होगा। सट्टा बाजार में फिल्म के बिजनेस के दाँव लगने लगने लगे। डिस्ट्रीब्यूटर के बीच बोली के भाव शुरू हो गए। किसी ने कहा कि यह फिल्म प्रचारित करने का पूर्वनियोजित फंडा है। कोई कहता है कि चुनावों के मूल मुद्दों से भटकाने का छलछंद है। कुछ स्वनामधन्य पत्रकार और चैनल संपादक फिल्म की अच्छाई के कसीदे पढ़ने तो कुछ इस कसीदाकारी से चिढ़ाने भी लगे। हवा में ये बातें भी तैरने लगीं कि इस फिल्म में एक सत्ताप्रिय उद्योगपति का धन लगा है तो इसका विवाद ब्रांडिंग करने वाली एजेंसी ने पैदा किया है। अंत में सबकोई संतुष्ट हो जाएंगे। जैसे दूसरी फिल्में रिलीज होती हैं वैसे ये भी होगी। कुलमिलाकर यही सबकुछ चल रहा है। गुजरात-हिमांचल चुनाव चर्चा के समानांतर। जीएसटी,ग्रोथरेट,मँहगाई, दिल्ली के प्रदूषण, आधे देश में अकाल की आहट, किसानों की मौत और एक बाद एक सामूहिक दुराचार की घटनाओं के घटाघोप में।

पहले पद्मावती के बारे में। पद्मावती का मूलकथा स्तोत्र मलिक मोहम्मद जायसी का महाकाव्य पद्मावत है। दोहा और चौपाइयों की मूलकाव्यधारा में प्राणप्रतिष्ठा का श्रेय जायसी को जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने इस विधा को मानस की रचना का आधार बनाकर लोकजयी बना दिया। जायसी के रचनधर्म और पद्मावत पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल, माताप्रसाद गुप्त और वासुदेवशरण अग्रवाल ने समालोचक टीकाएं लिखीं। जो मूल महाकाव्य के साथ अलग-अलग समय में प्रकाशित हुईं। पद्मावत पचास-साठ के दशक से ही पाठ्यक्रमों में हिंदी के विषयवस्तु के रूप में शामिल है। निश्चित ही अब तक इस महाकाव्य पर शताधिक शोधप्रबंध और टीकाएं लिखी गई होंगी। मेरे पास माताप्रसाद गुप्त द्वारा संपादित पद्मावत है। गुप्तजी की इसमें व्याख्यात्मक टिप्पणी है। प्रारंम्भ में ही महाकाव्य का कथासार लिखा है। यह पठनीय कहानी है जो प्रेम की गहराइयों की अनुभूति को छूती है। अलाउद्दीन खिलजी मुख्यखलपात्र तो है ही इसके अलावा भी राजा रतनसेन के दरबारी और सजातीय भी पद्मावती की चाहत में साजिशें रचते हैं। इस मूलकथा के साथ यदि छेड़छाड़ नहीं की गई है तो यह फिल्म भी मुगले आजम, ताजमहल,देवदास की श्रेणी की है। हिन्दी के उपरोक्त तीनों धुरंधर विद्वानों ने इस महाकाव्य को इतिहास से इतर माना है। जायसी ने लोक में प्रचलित कथा के आधार पर इस महाकाव्य का तानाबाना बुना है। इस रचनाकाल के आसपास इतिहास के कोई सूत्र नहीं मिलते जो यह बताएं कि पद्मावती और रतनसेन किसी राजवंश से ताल्लुक रखते हैं।  खिलजी क्रूर और नराधम था। संभवतः जायसी को उससे उपयुक्त कोई खलपात्र नहीं सूझा होगा। महाकाव्य में तोता चिंतामन हैं जो मानुष्य की भाँति संवाद करता है। जायसी ने अपनी कल्पनाओं की क्षमता के अनुरूप महाकाव्य के लालित्य और अलंकरण के लिए सुंदर और रोचक फंतासी रची है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जायसी सूफी परंपरा के संत थे और प्रेममार्गी थे। पद्मावती और रतनसेन के प्रेम के गूढ में वे ईश्वर को खोजते हैं। यहां यह जानना जरूरी है कि साहित्यकार और इतिहासकार में बड़ा फर्क होता है। इतिहासकार एक एक कथ्य तथ्य के आधार पर जोड़ता है और साहित्यकार इस बंधन से मुक्त कल्पनाओं के संसार का सृजन करता है। साहित्यकार लोकमानस के ज्यादा नजदीक होता है। इतिहास के रूखेपन से उसकी ज्यादा रुचि नहीं होती।

यह भी सत्य है कि इतिहास के समानांतर लोक की परंपरा भी चलती है। यह परंपरा श्रुति और स्मृति के आधार पर पीढी दर पीढी परिमार्जित होती जाती है। कई दृष्टांन्त तो ऐसे हैं जिसे इतिहासकार ने अपनी रचना में महिमामंडित किया लोक को ठीक नहीं लगा तो उसे खंडि़त करने में तनिक देर भी नहीं लगाई। महाभारतकार व्यास ने कर्ण को खलनायक बताने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। वही कर्ण लोक में इतना पूजित प्रसंसित नायक हो गया कि कृष्ण की महिमा बचाए रखने के लिए व्यास को श्रीमद्भभागवत् पुराण की रचना करनी पड़ी। कृष्ण के बरक्श राधा लोक की नायिका हैं,आराध्या हैं। महाभारत, भागवत् में राधा नहीं हैं। इस महादेवी को लोकमानस में गढ़ा गया है। उसी लोकमानस ने इसे कृष्ण से वृहत्तर बना दिया। बाल्मीक और गोस्वामीजी ने विभीषण को वैष्णव,महात्मा न जाने क्या-क्या कहके प्रशंसा नहीं की पर लोक को वह नहीं सुहाया। उसे भातृद्रोही,गद्दार और घाती ही माना है। मेघनाद, कुंभकर्ण के नामधारी हजारों की संख्या में मिल जाएंगे लेकिन किसी का नाम विभीषण है आज तक मैंने नहीं सुना।

पद्मिनी किसी राजवंश के जातीय गौरव नहीं हैं । वे लोकमानस द्वारा गढ़ी गई नायिका हैं। लोक नायिका हैं। लोक जिसे आदर देता है,जिसकी प्राणप्रतिष्ठा करता है वह उसके प्रति वैसा ही आस्थावान होता है जैसा कि किसी लौकिक विभूति के प्रति। यहां इस बात के छिद्रान्वेषण की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि उस विभूति का इतिहास से वास्तविता है भी या नहीं। यहां असली प्रश्न यह है कि जो लोकनायिका पद्मिनी और उनकी कथा सैकड़ों वर्षों से लोकमानस में अंकित है कहीं उससे तो छेड़छाड़ नहीं हुई? यदि भंसाली ने अपने हिसाब से फिल्मी पद्मिनी गढ़ी है भले ही वो चित्ताकर्षक है तो यह गलत है, इसका विरोध होना चाहिए लेकिन यदि पद्मिनी का वही उच्चादर्श और मर्यादा है जोकि शताब्दियों से कथाक्रम में चलता चला आ रहा है उसी को फिल्मांकित किया है तो उनकी प्रशंसा होनी चाहिए। अब प्रश्न यह है कि कौन तय करेगा? कुछ ने सुझाव दिए हैं कि राजघराने के प्रतिनिधियों को, राजपूत संगठनों के नेताओं को दिखाने के बाद तय होना चाहिये तो मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। पद्मिनी जातीय गौरव नहीं हैं वो लोकमानस की कोख से उपजी नायिका हैं। इसलिए यह वर्गीकरण एक नया वितंडावाद खड़ा करेगा। सेंसर बोर्ड है ही इसी के लिए। लोकतांत्रिक देश की सरकार द्वारा गठित एक संस्था है उस पर विश्वास करना होगा। देशभर के मानस का अधिकृत प्रतिनिधि वही है न कि मुट्ठीभर प्रतिनिधि। कला को विस्तार का संरक्षण मिलना चाहिए यदि वह मर्यादा और लोक आदर्शों के अनुरूप है तो।
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#vss

Sunday, 19 November 2017

19 नवम्बर, इंदिरा जन्म शताब्दी - एक स्मरण / विजय शंकर सिंह

आज 19 नवम्बर को इंदिरा गांधी का जन्मदिन भी है। वे जीवित रहतीं तो 100 वर्ष की होतीं। पर वे नहीं रही। कोई भी नहीं रहता 100 साल तक, ऐसा भी नहीं है । होंगे इक्के दुक्के लोग जिन्हें जीवेत शरदः शतम का आशीष फलीभूत हुआ होगा। आयु तो नियति के ही अधीन है। लंबा जीवन पाना उतना ज़रूरी है या नहीं इस पर विवाद हो सकता है पर अर्थपूर्ण और यादगार जीवन जीना सबसे आवश्यक है। जो भी उम्र खाते में मिले,  उसी में ऐसा कुछ हो जाय कि वह अमर रहे , यह एक विलक्षण और सौभाग्य की बात है।

इंदिरा ऐसी ही विलक्षण महिला थीं। वे देश की अब तक कि सबसे विवादास्पद पीएम भी रही हैं, उन्होंने संकट के समय देश का अत्यंत कुशलता और बहादुरी से नेतृत्व किया । अपनी लोकप्रियता के शिखर पर वे लोकतांत्रिक मूल्यों से डिरेल भी हो गयीं, और अंत मे वह जितनी कभी लोकप्रिय थीं उतनी हीं अलोलप्रिय भी हुयीं । जिस जनता ने उनमे कभी शक्ति रूप देखा था, उसी ने उन्हें कूड़ेदान में भी फेंकने में कोई संकोच नहीं किया। यही लोकतंत्र की खूबी है। " आवाज़ ए ख़ल्क़ को नक्कारा ए खुदा समझो ।"  जो दीवाल पर उभरती इबारत नहीं समझ सकते हैं वे फिसल जाते हैं। समय सबसे निर्मम होता है। वह कभी किसी के साथ सदैव नहीं रहता।

नीचे मैं उनके पिता जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखा गया एक पत्र प्रस्तुत कर रहा है। यह पत्र यह भी बताता है कि कैसे हम अपनी संतान को भविष्य के लिये मानसिक और बौद्धिक रूप से तैयार कर सकते है । यह पत्र तब लिखा गया था जब इंदिरा 10 वर्ष की थीं। यह पत्र सत्यग्रह.कॉम #satyagrah.scroll.in के एक लेख का अंश है । अंग्रेज़ी मे लिखे इस पत्र का अनुवाद उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने किया है । एक पिता की भूमिका में लिखा गया नेहरू का यह पत्र सभ्यता की सबसे सुंदर और सरल व्याख्या है।
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मैं आज तुम्हें पुराने जमाने की सभ्यता का कुछ हाल बताता हूं. लेकिन इसके पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि सभ्यता का अर्थ क्या है? कोश में तो इसका अर्थ लिखा है अच्छा करना, सुधारना, जंगली आदतों की जगह अच्छी आदतें पैदा करना. और इसका व्यवहार किसी समाज या जाति के लिए ही किया जाता है. आदमी की जंगली दशा को, जब वह बिल्कुल जानवरों-सा होता है, बर्बरता कहते हैं. सभ्यता बिल्कुल उसकी उलटी चीज है. हम बर्बरता से जितनी ही दूर जाते हैं उतने ही सभ्य होते जाते हैं.।

लेकिन हमें यह कैसे मालूम हो कि कोई आदमी या समाज जंगली है या सभ्य? यूरोप के बहुत-से आदमी समझते हैं कि हमीं सभ्य हैं और एशियावाले जंगली हैं. क्या इसका यह सबब है कि यूरोपवाले एशिया और अफ्रीकावालों से ज्यादा कपड़े पहनते हैं? लेकिन कपड़े तो आबोहवा पर निर्भर करते हैं. ठंडे मुल्क में लोग गर्म मुल्कवालों से ज्यादा कपड़े पहनते हैं. तो क्या इसका यह सबब है कि जिसके पास बंदूक है वह निहत्थे आदमी से ज्यादा मजबूत और इसलिए ज्यादा सभ्य है? चाहे वह ज्यादा सभ्य हो या न हो, कमजोर आदमी उससे यह नहीं कह सकता कि आप सभ्य नहीं हैं. कहीं मजबूत आदमी झल्ला कर उसे गोली मार दे, तो वह बेचारा क्या करेगा?

तुम्हें मालूम है कि कई साल पहले एक बड़ी लड़ाई हुई थी! दुनिया के बहुत से मुल्क उसमें शरीक थे और हर एक आदमी दूसरी तरफ के ज्यादा से ज्यादा आदमियों को मार डालने की कोशिश कर रहा था. अंग्रेज जर्मनी वालों के खून के प्यासे थे और जर्मन अंग्रेजों के खून के. इस लड़ाई में लाखों आदमी मारे गए और हजारों के अंग-भंग हो गए कोई अंधा हो गया, कोई लूला, कोई लंगड़ा ।

तुमने फ्रांस और दूसरी जगह भी ऐसे बहुत-से लड़ाई के जख्मी देखे होंगे. पेरिस की सुरंगवाली रेलगाड़ी में, जिसे मेट्रो कहते हैं, उनके लिए खास जगहें हैं. क्या तुम समझती हो कि इस तरह अपने भाइयों को मारना सभ्यता और समझदारी की बात है? दो आदमी गलियों में लड़ने लगते हैं, तो पुलिसवाले उनमें बीच बचाव कर देते हैं और लोग समझते हैं कि ये दोनों कितने बेवकूफ हैं. तो जब दो बड़े-बड़े मुल्क आपस में लड़ने लगें और हजारों और लाखों आदमियों को मार डालें तो वह कितनी बड़ी बेवकूफी और पागलपन है. यह ठीक वैसा ही है जैसे दो वहशी जंगलों में लड़ रहे हों. और अगर वहशी आदमी जंगली कहे जा सकते हैं तो वह मूर्ख कितने जंगली हैं जो इस तरह लड़ते हैं?

अगर इस निगाह से तुम इस मामले को देखो, तो तुम फौरन कहोगी कि इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, इटली और बहुत से दूसरे मुल्क जिन्होंने इतनी मार-काट की, जरा भी सभ्य नहीं हैं. और फिर भी तुम जानती हो कि इन मुल्कों में कितनी अच्छी-अच्छी चीजें हैं और वहां कितने अच्छे-अच्छे आदमी रहते हैं ।

अब तुम कहोगी कि सभ्यता का मतलब समझना आसान नहीं है, और यह ठीक है. यह बहुत ही मुश्किल मामला है. अच्छी-अच्छी इमारतें, अच्छी-अच्छी तस्वीरें और किताबें और तरह-तरह की दूसरी और खूबसूरत चीजें जरूर सभ्यता की पहचान हैं. मगर एक भला आदमी जो स्वार्थी नहीं है और सबकी भलाई के लिए दूसरों के साथ मिल कर काम करता है, सभ्यता की इससे भी बड़ी पहचान है. मिल कर काम करना अकेले काम करने से अच्छा है और सबकी भलाई के लिए एक साथ मिल कर काम करना सबसे अच्छी बात है.

http://satyagrah.scroll.in/article/103272/nehru-letter-india-premchand-translation-hindi
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इंदिरा एक ऐसे पिता की संतान थीं जो इंदिरा के बालपन में ही आज़ादी के लड़ाई में व्यस्त हो गये थे। एक समय तो ऐसा आया कि पूरा परिवार ही जेल में था। नेहरू ने जेल से ही इंदिरा को दुनिया की गतिविधियों का व्योरा नियमित पत्र के रूप में देने की परम्परा बनाये रखी। इन पत्रों का संकलन ' पिता के पत्र पुत्री के नाम ' में है। इनके अतिरिक्त, विश्व इतिहास की एक रूपरेखा भी उन्होंने पत्रों के माध्यम से इंदिरा को बताया था जिसका संकलन दो भागों में Glimpses of World History और इसका हिंदी अनुवाद, विश्व इतिहास की एक झलक के नाम से प्रकाशित हुआ है । इंदिरा को लिखे इन पत्रों ने उन्हें दुनिया भर की ऐतिहासिक घटनाओं को समझने के लिये मानसिक और बौद्धिक रूप से तैयार किया । पिता का यह शिक्षक रुप है।

आज उनकी जन्म शताब्दी पर उनका विनम्र स्मरण है।

© विजय शंकर सिंह

Saturday, 18 November 2017

18 नवम्बर, स्मरण, मेजर शैतान सिंह, परमवीर चक्र का बलिदान दिवस / विजय शंकर सिंह

मेजर शैतान सिंह 1962 के भारत चीन युद्ध मे शहीद हुये थे, और उन्हें परमवीर चक्र जो भारत में सैन्य वीरता का सर्वोच्च सम्मान होता है से सम्मानित किया गया था । मेजर शैतान सिंह जोधपुर राज में दिसंबर 1, 1924 को पैदा हुये थे और 18 नवम्बर 1962 को लद्दाख के पास रेजांग ला नामक स्थान पर, चीनी सेना से युद्ध के दौरान अदम्य वीरता का प्रदर्शन करते हुये शहीद हो गए थे । वे भारतीय सेना में 1949 में भर्ती हुये थे और 1962 तक रहे। वे सेना में मेजर थे ।

परमवीर चक्र के समय जो साइटेशन पढ़ा जाता है वह मैं नीचे दे रहा हूँ। साइटेशन में मेडल प्राप्त कर्ता की उन उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण रहता है जिनके कारण उसे उस पदक से सम्मानित किया जा रहा है । परमवीर चक्र युध्द क्षेत्र में शहीद होने वाले सैनिक को मिलने वाला सर्वोच्च सम्मान है ।

इस साइटेशन के अनुसार, 13 कुमाऊ रेजिमेंट के मेजर शैतान सिंह, चुशूल सेक्टर, लद्दाख के रेजांग ला नामक स्थान पर जो 17000 फ़ीट की ऊंचाई पर था एक इन्फैंट्री बटालियन की एक कम्पनी को कमांड कर रहे थे । वही चीनी सैनिकों से उनका आमना सामना हुआ और वही वह युद्ध मे खेत रहे । पूरा साइटेशन पढ़ें ।

#ParamVirChakra_Citation
The citation for the Param Vir Chakra awarded to
Major Shaitan Singh
13 KUMAON (IC 7990)

Major Shaitan singh was commanding a company of an infantry battalion deployed at Rezang La in the Chusul sector at a height of about 17,000 feet. The locality was isolated from the main defended sector and consisted of five platoon-defended position. On 18 November 1962, the Chinese forces subjected the company position to heavy artillery, mortar and small arms fire and attacked it in overwhelming strength in several successive waves. Against heavy odds, our troops beat back successive waves of enemy attack. During the action, Major Shaitan Singh dominated the scene of operations and moved at great personal risk from one platoon post to another sustaining the morale of his hard-pressed platoon posts. While doing so he was seriously wounded but continued to encourage and lead his men, who, following his brave example fought gallantly and inflicted heavy casualties on the enemy. For every man lost to us, the enemy lost four or five. When Major Shaitan Singh fell disabled by wounds in his arms and abdomen, his men tried to evacuate him but they came under heavy machine-gun fire. Major Shaitan Singh then ordered his men to leave him to his fate in order to save their lives.

Major Shaitan Singh's supreme courage, leadership and exemplary devotion to duty inspired his company to fight almost to the last man.
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सूरा सो पहचानिये लड़े दीन के हेत,
पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट मरै, तबहुँ न छाड़ें खेत !!
मेजर शैतान सिंह के बलिदान दिवस पर उन्हें वीरोचित स्मरण और श्रद्धांजलि ।
जय हिंद ।

© विजय शंकर सिंह

Friday, 17 November 2017

जब तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो ! ' - अकबर इलाहाबादी / विजय शंकर सिंह

                                                                                   
अकबर इलाहाबादी का यह बहुत प्रसिद्ध कलाम है । अकबर इलाहाबादी का पूरा नाम सैयद अकबर हुसैन था और वे इलाहाबाद के पास बारा के रहने वाले थे । उनका जन्म 16 नवम्बर 1846 को एक प्रतिष्ठित परिवार में और देहांत 9 सितम्बर 1921 को इलाहाबाद में हुआ था । अकबर ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने पिता सैयद तफ़ज़्ज़ुल हुसैन द्वारा घर पर ही ग्रहण की थी। अकबर ने वकालत की पढ़ाई की, फिर सरकारी नौकरी तथा बाद सिविल जज बने ।
अकबर अपने प्रारंभिक दौर में एक जीवंत, और आशावादी शायर थे । वे बेहद जिंदादिल इंसान थे बाद में उनके जीवन मे कुछ ऐसी त्रासद घटनाएं घटी, जिस से उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल गया । उनके पुत्र और पौत्र का निधन कम उम्र में ही हो गया था। यह किसी के लिये भी एक महाघात है । यह सदमा उनके लिये भी एक बड़ा झटका था और इस आघात ने उन्हें निराशा के गर्त में डाल दिया । इसका असर उनकी शायरी पर भी पड़ा है।
अकबर का काल भारतीय जनमानस के उत्थान का काल था । उनके जन्म के 11 साल बाद ही 1857 का विप्लव हुआ और 1858 में ब्रिटेन ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को हटा कर भारत को सीधे अपने अधीन कर लिया । महारानी की घोषणा 1858 में हुयी और कम्पनी का अराजक राज समाप्त हो गया । सन 1861 में प्रशासनिक कानून बने और उन्हें लागू किया गया । उस समय महत्वपूर्ण पदों पर बड़े जमीनदारों और ताल्लुकदारों के बेटों को सरकारी नौकरी में रखे जाने की परंपरा अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी थी। अंग्रेज़ अपनी लोकतांत्रिक परम्पराओं के कारण इस तथ्य से परिचित थे कि दुनिया भर में फैल रही आधुनिक शिक्षा और फ्रांस की राज्यक्रांति के बाद जो लोकतांत्रिक मूल्य यूरोप में स्थापित हो चुके हैं उसकी भी अनुगूँज देर सबेर भारत पहुंचेगी ही। बंगाल के पुनर्जागरण, महाराष्ट्र के बदलाव की दस्तक से वे अनजान नहीं थे। वे भारतीय समाज मे खुद को उदार, लोकतांत्रिक मूल्यों पर आस्था रखने वाला, और जनापेक्षी शासक साबित करना चाहते थे । यह उनकी एक कुटिल चाल थी। अंग्रेजों ने प्रारंभिक दौर में हिंदुस्तानी ज़मीदारों के पुत्रों को अत्यंत महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया था । वे एक ऐसा उपकृत वर्ग बनाना चाहते थे जो उनके प्रति वफादार रहे । वे ऐसा करने में सफल भी रहे। तभी उन्होंने 1857 के बाद किसी भी रियासत को अधिकृत करने का प्रयास नहीं किया और सभी को उन्होंने उनके क्षेत्रफल, आय आदि के अनुसार सम्मान भी दिया । उन्होंने ऐसे लोगो को मध्यम प्रशासनिक पदों पर ही नियुक्त किया । अकबर भी इसी परंपरा में जज बने और सिविल जज के पद से रिटायर हो गये । वे एक शानदार, तर्कशील, मिलनसार आदमी थे। और उनकी कविता हास्य की एक उल्लेखनीय भावना के साथ कविता की पहचान थी। वो चाहे गजल, नजम, रुबाई या क़ित हो उनका अपना ही एक अलग अन्दाज़ था। वह एक समाज सुधारक थे और उनके सुधारवादी उत्साह बुद्धि और हास्य के माध्यम से काम किया था। शायद ही जीवन का कोई पहलू है जो उन्के व्यंग्य की निगाहों से बच गया था।
अकबर ने व्यंग्यपूर्ण शायरी लिखी है, तो राजनीतिक और अंग्रेज़ी शासन की विसंगतियों पर भी लिखा है । कुछ बेहद रोमांटिक ग़ज़लें लिखी हैं तो, सूफियाना शायरी भी इन्होंने की है ।
उनकी यह रचना पढ़ें ।
हिन्द में तो मज़हबी हालत है अब नागुफ़्ता बेह
मौलवी की मौलवी से रूबकारी हो गई
एक डिनर में खा गया इतना कि तन से निकली जान
ख़िदमते-क़ौमी में बारे जाँनिसारी हो गई
अपने सैलाने-तबीयत पर जो की मैंने नज़र
आप ही अपनी मुझे बेएतबारी हो गई
नज्द में भी मग़रिबी तालीम जारी हो गई
लैला-ओ-मजनूँ में आख़िर फ़ौजदारी हो गई
शब्दार्थ :नागुफ़्ता बेह= जिसका ना कहना ही बेहतर हो;
रूबकारी=जान-पहचान
जाँनिसारी= जान क़ुर्बान करना
सैलाने-तबीयत= तबीयत की आवारागर्दी
नज्द= अरब के एक जंगल का नाम जहाँ मजनू मारा-मारा फिरता था।
यह उस समय के मजहबी हालात पर उनका यह तब्सिरा है । उन्होंने धर्म की राजनीति करने वालों और अंग्रेज़ो के पिछलग्गुओं पर बेहद चुटीले शेर लिखे हैं । उनका यह शेर पढ़ें । आज के हालात भी उनके समय के जो लगभग सौ साल पहले की के हालात थे से जुदा नहीं है । यह मौज़ू शेर पढ़ें ।
हालात मुख्तलिफ हैं, ज़रा सोच लो यह बात,
दुश्मन तो चाहते हैं कि, आपस मे लड़ मरें !!
जिस दुश्मन की बात अकबर कर रहे हैं वे अंग्रेज़ थे । वह ब्रिटिश हुकूमत थी। जो भारत का सामाजिक ताना बाना तोड़ कर देश पर राज कर रही थी। तब अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद ज़िंदा था । हिन्दू मुस्लिम एकता अंग्रेज़ो के लिये सदैव चुनौती बनी रही। 1857 के विप्लव में वे इस एकता का का खामियाजा भुगत चुके थे । वे नहीं चाहते थे कि दोनों में सामंजस्य पनपे । वे निरन्तर कभी हिंदुओं के तो कभी मुस्लिमों की पीठ पर हाँथ रख कर अपना उल्लू सीधा करते रहे । अकबर ने इसी को इस शेर में इंगित किया है ।
अकबर मूलतः उर्दू के कवि थे, लेकिन उन्होंने अपनी लेखनी में इंगिल्श के शब्दों का भी इस्तेमाल किया है। ' गांधीनामा ' में उन्होंने गांधी जी के ऊपर कई कविताएं भी लिखी हैं। इतना ही नहीं नहीं अकबर इलाहबादी को एक हास्य कवि के रूप में भी जाना जाता है। लेकिन उनकी शायरी में गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की इच्छा छिपी होती थी ।
अकबर इलाहबादी ने अपनी शायरी में कई बेहद चुभने वाले तंज कसे हैं। अपने तंज के बाणों के दम पर कभी शराब को हाथ न लगाने वाले अकबर ने शराब के पक्ष में एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल ही लिख दी जो उनकी अत्यंत लोकप्रिय गज़लों में से एक है ।
हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है।
अकबर ने ज़िंदगी को बहुत करीब से देखा है और उनकी शायरी में इस बात की झलक दिखती है। इतना ही नहीं अकबर ने महिलाओं और मुस्लिम समाज में पर्दा की कुरीतियों के खिलाफ लिखते हुए लिखा कि...
'बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियां
'अकबर' ज़मीं में गैरते क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो उनसे -'आपका पर्दा कहाँ गया?'
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया।'

© विजय शंकर सिंह

Tuesday, 14 November 2017

कवि कुंवर नारायण का निधन और उनकी एक कविता , अयोध्या 1992 / विजय शंकर सिंह

                                                                               

कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में बुधवार को निधन हो गया. मूलरूप से फैजाबाद के रहने वाले कुंवर नारायण पिछले करीब 51 साल से साहित्य में सक्रिय थे. उनकी पहली किताब 'चक्रव्यूह' साल 1956 में आई थी. राजनैतिक विवाद से हमेशा दूरी बनाए रखने वाले कुंवर को 41वां ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था. साल 1995 में उन्हें साहित्य अकादमी और साल 2009 में उन्हें पद्म भूषण अवार्ड मिला था । उनकी काव्ययात्रा 'चक्रव्यूह' से शुरू हुई। ... जहाँ एक ओर आत्मजयी में कुँवरनारायण जी ने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत 'वाजश्रवा के बहाने'कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है।
कुँवर नारायण का जन्म १९  सितंबर 1927 को हुआ। नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (1959 ) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। कुँवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहासऔर मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। कुंवर नारायण का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं। यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता रही है पर इसके अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी लेखनी चलायी है। इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। उनकी कविताओं-कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। ‘तनाव‘ पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया है। 2009 में कुँवर नारायण को वर्ष 2005 के लिए देश के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
फैज़ाबाद अयोध्या के रहने वाले थे वे । अयोधया 1992 पर उन्होंने एक चर्चित कविता लिखी थी। उसे पढ़े,

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अयोध्या, 1992
( कुंवर नारायण )
हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य
अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !
हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक....
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !
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उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं,
कविता संग्रह - चक्रव्यूह ( 1956 ), तीसरा सप्तक( 1959 ),परिवेश : हम-तुम( 1961 ), अपने सामने ( 1979 ), कोई दूसरा नहीं( 1993 ), इन दिनों( 2002 )।
खंड काव्य - आत्मजयी ( 1965 ) और वाजश्रवा के बहाने( 2008 )।
कहानी संग्रह - आकारों के आसपास ( 1973 )।
समीक्षा विचार - आज और आज से पहले( 1998 ), मेरे साक्षात्कार ( 1999 ), साहित्य के कुछ अन्तर्विषयक संदर्भ( 2003 )।
संकलन - कुंवर नारायण-संसार (चुने हुए लेखों का संग्रह) 2002 ,कुँवर नारायण उपस्थिति (चुने हुए लेखों का संग्रह)( 2002 ), कुँवर नारायण चुनी हुई कविताएँ ( 2007 ), कुँवर नारायण- प्रतिनिधि कविताएँ ( 2008 )

ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मान के अलावा कुँवर नारायण को साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, कुमार आशान पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार, राष्ट्रीय कबीर सम्मान, शलाका सम्मान, मेडल ऑफ़ वॉरसा यूनिवर्सिटी, पोलैंड और रोम के अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फ़ेरेनिया सम्मान और 2009 में पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।

इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया ।
अलविदा ।
#कुंवर_नारायण
दिवंगत कवि को विनम्र श्रद्धांजलि ।

© विजय शंकर सिंह

14 नवम्बर, जन्मदिन - जवाहरलाल नेहरू , एक स्मरण / विजय शंकर सिंह

                                                                              
आज जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है । उनका यह उद्धरण उनकी प्रसिद्ध पुस्तक " हिंदुस्तान की कहानी " "The Discovery Of India " से लिया गया है । यह उद्धरण उनकी दृष्टि को परिभाषित करता है ।  नेहरू द्वारा लिखी गयी अनेक किताबों में से, उनकी यह किताब सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है । भारत की विशाल सोच, दर्शन, महान संस्कृति की पड़ताल करने की उनकी यह कोशिश है । नेहरू इतिहास के कोई विद्यार्थी नहीं थे। वे के एक वकील थे जो बाद में राजनीति में आये।  वे कोई अकादमिक शख्सियत नहीं थे, न ही इतिहास के मौलिक शोधकर्ता, अपितु उन्होंने सार्वजनिक जीवन मे आने के बाद भारत से जो उनका संवाद हुआ, लोगों से जो उनकी सम्प्रेषणीयता बनी, जैसा भारत उन्होंने देखा और महसूस किया वैसा उन्होंने अपनी खूबसूरत शैली में पन्नों पर उतार दिया । उन्होंने इतिहास नहीं लिखा है और न ही ऐतिहासिक तिथिक्रम क्रोनोलॉजिकल chronological , जैसा उबा देने वाला कोई  विवरण दिया हैं पर इतिहास के सभी कालों, सभी स्तरों, दर्शन की सभी आयामों को समेटने का एक प्रयास किया है । उनकी यह पुस्तक पठनीय है । नेहरू का अध्ययन, लेखन, सोच और भारत के प्रति उनकी दृष्टि इस पुस्तक में प्रतिविम्बित हुयी है।

नेहरू, एक राज नेता थे, स्वाधीनता संग्राम के सेनानी थे, कांग्रेस के उस ऐतिहासिक अधिवेशन में अध्यक्ष हुए थे, जिसमें कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास कर के ब्रिटेन को स्पष्ट संकेत दे दिया था कि उन्हें अब यहाँ से रुखसत होना ही होगा । वह दिन था 26 जनवरी 1930 का जब पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य का जश्न मनाया गया था । यही दिन 26 जनवरी 1950 को संविधान अंगीकार करने के बाद हमारा गणतंत्र दिवस बना । नेहरू ने अपने जीवन के लगभग 9 साल कारागार में काटे है । न वे अकेले स्वाधीनता सेनानी थे और न ही यह आज़ादी उनका ही इकलौता प्रयास है, बस वह उस महान यज्ञ के एक कार्यकर्ता थे जो हमारी आज़ादी के लिये आहूत हो रहा था । 

उन्होने लिखा है,
" अकाल और लड़ाई चाहे हो या न हों लेकिन अपने जन्मजात अंतर्विरोधों से पूर्ण और उन्हीं विरोधों और उनसे प्रतिफलित विनाशों से पोषण पाती हुई जीवन की धारा बराबर चालू रहती है| प्रकृति अपना कायाकल्प करती है और कल के लड़ाई के मैदान को आज फूलों और हरी घास से ढकदेती है,और पहले जो खून गिरा था,वह अब जमीन को सींचता है और नए जीवन को रंग,रूप और शक्ति देता है|इंसान,जिसमे याददाश्त का गैरमामूली गुणहोता है,गुजरे हुए ज़माने की कहानियों और घटनाओं से चिपटा रहता है|वह शायद ही कभी मौजूदा वख्त के साथ चलता हो,जिसमें वह दुनिया है,जो हर रोज नई ही दिखाई देती है|मौजूदा वख्त,इससे पहले कि हमको उसका पूरा होश हो,गुजरे ज़माने में खिसक जाता है;आज,जो बीती हुई कल का बच्चा है,खुद अपनी जगह अपनी संतान,आने वाली कल को दे जाता है|मार्के की जीत का ख़ात्मा खून और दलदल में होता है,मालूम पड़ने वाली हार की कड़ी जाँच में से तब उस भावनाका जन्म होता है जिसमे नई ताकत होती है और जिसके नजरिये में फैलाव होता है|कमजोर भावनावाले झुक जाते हैं,और वे हटा दिए जाते हैं,लेकिन बाकी लोग प्रकाश ज्योति को आगे ले चलते हैंऔर उसे आने वाले कल के मार्गदर्शकों को सौंप देते हैं| "
( हिंदुस्तान की कहानी )

नेहरू का विरोध और उनके एडविना के साथ मित्रता को ले कर अक्सर दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग उनकी आलोचना करते रहते हैं । जब कि वास्तविकता यह है कि वे मानसिक रूप से रुग्ण हैं। कुंठित है । आत्मरति में सुख खोजते है । वर्जनाओं से मुक्त होने का साहस नहीं है उनमें। यह एक प्रकार की क्लीवता है । उनसे गांधी की बात कीजिये । वे सम्पूर्ण गांधी वांग्मय जो 101 खण्डों का है में उन्हें गांधी के सेक्स के प्रयोग के संदर्भ ही याद आएंगे । उनसे नेहरू के लिखे साहित्य पर चर्चा कीजिये उन्हें नेहरू के पूरे जीवन मे एडविना से जुड़े सम्बन्ध याद आएंगे । यह एक प्रकार की ग्रन्थि है । अगर आप फ्रायड को पढ़े होंगे तो इसे आसानी से समझ लेंगे । गांधी नेहरू ने उनका खेल जो वे जिन्ना के साथ मिल कर खेलना चाहते थे उसे बिगाड़ दिया था। जिन्ना ने अधिसंख्य मुस्लिम आबादी को तो सम्मोहित कर लिया था । चाहते तो ये भी थे कि मुस्लिम राष्ट्र की तरह यहां भी हिन्दू राष्ट्र बन जाय । पर सनातन संस्कृति की आत्मा जो अनेकता में एकता है और जो इसकी जिजीविषा है को यह समझ नहीं पाए। इस्लाम एक रेजिमेंटल धर्म है जब कि सनातन धर्म कभी रेजिमेंटल धर्म रहा ही नहीं है और इसी कारण यह एक जीवन पद्धति है , कोई पंथ नहीं है, यह सूक्ष्म भाव यह न तब समझ पाए और न अब । गांधी का करिश्मा, नेहरू की लोकप्रियता और पटेल की लौह इच्छा शक्ति ने भारत को जिस पथ पर आगे बढाया वह पथ न इन्हें तब रास आया था और न अब रास आ रहा है । ये बार बार 1947 के पहले अपने तय किये एजेंडे पर लौट जाना चाहते हैं। पर तब से गंगा और यमुना में बहुत पानी बह चुका है । समय बढ़ गया है । वे न गांधी को पढ़ते हैं, न नेहरू को, यहां तक कि पटेल को भी नहीं, अम्वेडकर का नाम लेना इनकी मज़बूरी है पर रिड्ल्स इन हिन्दूइज़्म पढ़ते ही यह फिर ' जैसे थे ' हो जाते हैं । 

' वे ' से मेरा तात्पर्य उस दक्षिणपंथी विचारधारा से है जो यूरोपीय फासिज़्म की सोच से देश मे अंकुरित हुयी,  जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ एक शब्द भी कभी नहीं कहा, अपितु उनके कृपापात्र ही बने रहे और धर्म के मिथ्या आवरण को ही धर्म समझते रहते हैं । 

आज़ादी के बाद वे देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने । आज जवाहरलाल नेहरू की जन्म तिथि पर उनका विनम्र स्मरण । 

© विजय शंकर सिंह