Sunday, 17 September 2017

प्रेमचंद के ' गोदान ' का तर्पण / विजय शंकर सिंह

केंद्रीय हिंदी संस्थान ने प्रेमचंद के अमर उपन्यास गोदान को अपने पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया है । ऐसा क्यों किया है, इसका कारण और स्पष्टीकरण भी उन्होंने बड़ा ही अज़ीब ओ गरीब दिया है । केंद्रीय हिंदी संस्थान की दलील है कि,
" उपन्यास की ग्रामीण पृष्ठभूमि और इसमें प्रयुक्त अवधी भाषा का पुट विदेशी छात्रों को समझ में नहीं आता लिहाज़ा उन्हें बड़ी दिक्कत होती है । "
यह दलील किस वकील ने इज़ाद की है यह तो मुझे नहीं मालूम पर यह दलील न केवल बचकानी है बल्कि, यह एक षडयंत्र के अंतर्गत दी गयी लगती है ।

गोदान, ग्रामीण पृष्ठभूमि पर और कर्मकाण्ड की विडम्बनाओं के बीच जीवन को खींच रहे होरी नामक एक ऐसे किसान की व्यथा की महागाथा है जिसने तत्कालीन किसानों के जीवन, उनकी भाषा, उनके सामाजिक रीति रिवाज की वर्जनाएं, आदि को प्रतिविम्बित कर दिया है । प्रेमचंद ने कुल 9 उपन्यास और 200 से अधिक कहानियाँ लिखी है । प्रेमचन्द का यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। कुछ लोग इसे उनकी सर्वोत्तम कृति भी मानते हैं। इसका प्रकाशन 1936  ई० में हुआ था । इसमें प्रगतिवाद, गांधीवाद और मार्क्सवाद (साम्यवाद) का पूर्ण परिप्रेक्ष्य में चित्रण हुआ है। गोदान के नायक और नायिका होरी और धनिया के परिवार के रूप में हम भारत की एक विशेष संस्कृति को सजीव और साकार पाते हैं, ऐसी संस्कृति जो अब समाप्त हो रही है या हो जाने को है, फिर भी जिसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुबास भरी है। प्रेमचंद ने इसे अमर बना दिया है।

जिस समय प्रेमचन्द का जन्म हुआ वह युग सामाजिक-धार्मिक रुढ़िवाद से भरा हुआ था। इस रुढ़िवाद से स्वयं प्रेमचन्द भी प्रभावित हुए। जब अपने कथा-साहित्य का सफर शुरु किया अनेकों प्रकार के रुढ़िवाद से ग्रस्त समाज को यथाशक्ति साहित्य के  द्वारा मुक्त कराने का संकल्प लिया। अपनी एक कहानी के एक पात्र के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि
"मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बन्धनों का दास नहीं हूँ।"
वह कहते हैं कि समाज में जिन्दा रहने में जितनी कठिनाइयों का सामना लोग करेंगे उतना ही वहाँ गुनाह होगा। अगर समाज में लोग खुशहाल होंगे तो समाज में अच्छाई ज्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा। प्रेमचन्द ने शोषितवर्ग के लोगों को उठाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने आवाज लगाई
"ए लोगों जब तुम्हें संसार में रहना है तो जिन्दों की तरह रहो, मुर्दों की तरह जिन्दा रहने से क्या फायदा।"

गोदान में बहुत सी बातें कही गई हैं। ऐसा लगता है प्रेमचंद ने अपने संपूर्ण जीवन के व्यंग और विनोद, कसक और वेदना, विद्रोह और वैराग्य, अनुभव और आदर्श् सभी को इसी एक उपन्यास में भर देना चाहा है। कुछ आलाचकों को इसी कारण उसमें अस्तव्यस्तता मिलती है। उसका कथानक शिथिल, अनियंत्रित और स्थान-स्थान पर अति नाटकीय जान पड़ता है। ऊपर से देखने पर है भी ऐसा ही, परंतु सूक्ष्म रूप से देखने पर गोदान में लेखक का अद्भुत उपन्यास-कौशल दिखाई पड़ेगा क्योंकि उन्होंने जितनी बातें कहीं हैं वे सभी समुचित उठान में कहीं गई हैं। प्रेमचंद ने एक स्थान पर लिखा है -
" उपन्यास में आपकी कलम में जितनी शक्ति हो अपना जोर दिखाइए, राजनीति पर तर्क कीजिए, किसी महफिल के वर्णन में १०-२० पृष्ठ लिख डालिए (भाषा सरस होनी चाहिए), कोई दूषण नहीं।"
प्रेमचंद ने गोदान में अपनी कलम का पूरा जोर दिखाया है। सभी बातें कहने के लिये उपयुक्त प्रसंगकल्पना, समुचित तर्कजाल और सही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रवाहशील, चुस्त और दुरुस्त भाषा और वणर्नशैली में उपस्थित कर देना प्रेमचंद का अपना विशेष कौशल है और इस दृष्टि से उनकी तुलना में शायद ही किसी उपन्यास लेखक को रखा जा सकता है।

' गोदान' न सिर्फ प्रेमचंद की सवोत्तम कृति के रूप में आलोचकों द्वारा मानी गयी है, अपितु यह भारतीय भाषाओँ की साहित्यिक पुस्तकों में सर्वाधिक बिक्री के कीर्तिमान भी यह उपन्यास बना चुका है । दुनिया की अनेक भाषाओं में भी इसका अनुवाद हो चुका है । संस्थान की अवधी भाषा की दलील को मानें तो क्या तुलसी का  " राम चरित मानस ' और जायसी का " पद्मावत " जो अवधी में ही है को भी उसके पाठ्यक्रमों से निकाल देना चाहिये ?  पितृपक्ष में मैं इसे गोदान का तर्पण ही कहूँगा । इस उपन्यास पर कुछ भी लिखने से पहले मित्रों से अनुरोध है कि यह उपन्यास और प्रेमचंद की चुनिंदा कहानियाँ पढ़ लें ।
© विजय शंकर सिंह

प्रेमचंद के ' गोदान ' का तर्पण / विजय शंकर सिंह

केंद्रीय हिंदी संस्थान ने प्रेमचंद के अमर उपन्यास गोदान को अपने पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया है । ऐसा क्यों किया है, इसका कारण और स्पष्टीकरण भी उन्होंने बड़ा ही अज़ीब ओ गरीब दिया है । केंद्रीय हिंदी संस्थान की दलील है कि,
" उपन्यास की ग्रामीण पृष्ठभूमि और इसमें प्रयुक्त अवधी भाषा का पुट विदेशी छात्रों को समझ में नहीं आता लिहाज़ा उन्हें बड़ी दिक्कत होती है । "
यह दलील किस वकील ने इज़ाद की है यह तो मुझे नहीं मालूम पर यह दलील न केवल बचकानी है बल्कि, यह एक षडयंत्र के अंतर्गत दी गयी लगती है ।

गोदान, ग्रामीण पृष्ठभूमि पर और कर्मकाण्ड की विडम्बनाओं के बीच जीवन को खींच रहे होरी नामक एक ऐसे किसान की व्यथा की महागाथा है जिसने तत्कालीन किसानों के जीवन, उनकी भाषा, उनके सामाजिक रीति रिवाज की वर्जनाएं, आदि को प्रतिविम्बित कर दिया है । प्रेमचंद ने कुल 9 उपन्यास और 200 से अधिक कहानियाँ लिखी है । प्रेमचन्द का यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। कुछ लोग इसे उनकी सर्वोत्तम कृति भी मानते हैं। इसका प्रकाशन 1936  ई० में हुआ था । इसमें प्रगतिवाद, गांधीवाद और मार्क्सवाद (साम्यवाद) का पूर्ण परिप्रेक्ष्य में चित्रण हुआ है। गोदान के नायक और नायिका होरी और धनिया के परिवार के रूप में हम भारत की एक विशेष संस्कृति को सजीव और साकार पाते हैं, ऐसी संस्कृति जो अब समाप्त हो रही है या हो जाने को है, फिर भी जिसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुबास भरी है। प्रेमचंद ने इसे अमर बना दिया है।

जिस समय प्रेमचन्द का जन्म हुआ वह युग सामाजिक-धार्मिक रुढ़िवाद से भरा हुआ था। इस रुढ़िवाद से स्वयं प्रेमचन्द भी प्रभावित हुए। जब अपने कथा-साहित्य का सफर शुरु किया अनेकों प्रकार के रुढ़िवाद से ग्रस्त समाज को यथाशक्ति साहित्य के  द्वारा मुक्त कराने का संकल्प लिया। अपनी एक कहानी के एक पात्र के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि
"मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बन्धनों का दास नहीं हूँ।"
वह कहते हैं कि समाज में जिन्दा रहने में जितनी कठिनाइयों का सामना लोग करेंगे उतना ही वहाँ गुनाह होगा। अगर समाज में लोग खुशहाल होंगे तो समाज में अच्छाई ज्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा। प्रेमचन्द ने शोषितवर्ग के लोगों को उठाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने आवाज लगाई
"ए लोगों जब तुम्हें संसार में रहना है तो जिन्दों की तरह रहो, मुर्दों की तरह जिन्दा रहने से क्या फायदा।"

गोदान में बहुत सी बातें कही गई हैं। ऐसा लगता है प्रेमचंद ने अपने संपूर्ण जीवन के व्यंग और विनोद, कसक और वेदना, विद्रोह और वैराग्य, अनुभव और आदर्श् सभी को इसी एक उपन्यास में भर देना चाहा है। कुछ आलाचकों को इसी कारण उसमें अस्तव्यस्तता मिलती है। उसका कथानक शिथिल, अनियंत्रित और स्थान-स्थान पर अति नाटकीय जान पड़ता है। ऊपर से देखने पर है भी ऐसा ही, परंतु सूक्ष्म रूप से देखने पर गोदान में लेखक का अद्भुत उपन्यास-कौशल दिखाई पड़ेगा क्योंकि उन्होंने जितनी बातें कहीं हैं वे सभी समुचित उठान में कहीं गई हैं। प्रेमचंद ने एक स्थान पर लिखा है -
" उपन्यास में आपकी कलम में जितनी शक्ति हो अपना जोर दिखाइए, राजनीति पर तर्क कीजिए, किसी महफिल के वर्णन में १०-२० पृष्ठ लिख डालिए (भाषा सरस होनी चाहिए), कोई दूषण नहीं।"
प्रेमचंद ने गोदान में अपनी कलम का पूरा जोर दिखाया है। सभी बातें कहने के लिये उपयुक्त प्रसंगकल्पना, समुचित तर्कजाल और सही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रवाहशील, चुस्त और दुरुस्त भाषा और वणर्नशैली में उपस्थित कर देना प्रेमचंद का अपना विशेष कौशल है और इस दृष्टि से उनकी तुलना में शायद ही किसी उपन्यास लेखक को रखा जा सकता है।

' गोदान' न सिर्फ प्रेमचंद की सवोत्तम कृति के रूप में आलोचकों द्वारा मानी गयी है, अपितु यह भारतीय भाषाओँ की साहित्यिक पुस्तकों में सर्वाधिक बिक्री के कीर्तिमान भी यह उपन्यास बना चुका है । दुनिया की अनेक भाषाओं में भी इसका अनुवाद हो चुका है । संस्थान की अवधी भाषा की दलील को मानें तो क्या तुलसी का  " राम चरित मानस ' और जायसी का " पद्मावत " जो अवधी में ही है को भी उसके पाठ्यक्रमों से निकाल देना चाहिये ?  पितृपक्ष में मैं इसे गोदान का तर्पण ही कहूँगा । इस उपन्यास पर कुछ भी लिखने से पहले मित्रों से अनुरोध है कि यह उपन्यास और प्रेमचंद की चुनिंदा कहानियाँ पढ़ लें ।
© विजय शंकर सिंह

प्रेमचंद के ' गोदान ' का तर्पण / विजय शंकर सिंह

केंद्रीय हिंदी संस्थान ने प्रेमचंद के अमर उपन्यास गोदान को अपने पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया है । ऐसा क्यों किया है, इसका कारण और स्पष्टीकरण भी उन्होंने बड़ा ही अज़ीब ओ गरीब दिया है । केंद्रीय हिंदी संस्थान की दलील है कि,
" उपन्यास की ग्रामीण पृष्ठभूमि और इसमें प्रयुक्त अवधी भाषा का पुट विदेशी छात्रों को समझ में नहीं आता लिहाज़ा उन्हें बड़ी दिक्कत होती है । "
यह दलील किस वकील ने इज़ाद की है यह तो मुझे नहीं मालूम पर यह दलील न केवल बचकानी है बल्कि, यह एक षडयंत्र के अंतर्गत दी गयी लगती है ।

गोदान, ग्रामीण पृष्ठभूमि पर और कर्मकाण्ड की विडम्बनाओं के बीच जीवन को खींच रहे होरी नामक एक ऐसे किसान की व्यथा की महागाथा है जिसने तत्कालीन किसानों के जीवन, उनकी भाषा, उनके सामाजिक रीति रिवाज की वर्जनाएं, आदि को प्रतिविम्बित कर दिया है । प्रेमचंद ने कुल 9 उपन्यास और 200 से अधिक कहानियाँ लिखी है । प्रेमचन्द का यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। कुछ लोग इसे उनकी सर्वोत्तम कृति भी मानते हैं। इसका प्रकाशन 1936  ई० में हुआ था । इसमें प्रगतिवाद, गांधीवाद और मार्क्सवाद (साम्यवाद) का पूर्ण परिप्रेक्ष्य में चित्रण हुआ है। गोदान के नायक और नायिका होरी और धनिया के परिवार के रूप में हम भारत की एक विशेष संस्कृति को सजीव और साकार पाते हैं, ऐसी संस्कृति जो अब समाप्त हो रही है या हो जाने को है, फिर भी जिसमें भारत की मिट्टी की सोंधी सुबास भरी है। प्रेमचंद ने इसे अमर बना दिया है।

जिस समय प्रेमचन्द का जन्म हुआ वह युग सामाजिक-धार्मिक रुढ़िवाद से भरा हुआ था। इस रुढ़िवाद से स्वयं प्रेमचन्द भी प्रभावित हुए। जब अपने कथा-साहित्य का सफर शुरु किया अनेकों प्रकार के रुढ़िवाद से ग्रस्त समाज को यथाशक्ति साहित्य के  द्वारा मुक्त कराने का संकल्प लिया। अपनी एक कहानी के एक पात्र के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि
"मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बन्धनों का दास नहीं हूँ।"
वह कहते हैं कि समाज में जिन्दा रहने में जितनी कठिनाइयों का सामना लोग करेंगे उतना ही वहाँ गुनाह होगा। अगर समाज में लोग खुशहाल होंगे तो समाज में अच्छाई ज्यादा होगी और समाज में गुनाह नहीं के बराबर होगा। प्रेमचन्द ने शोषितवर्ग के लोगों को उठाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने आवाज लगाई
"ए लोगों जब तुम्हें संसार में रहना है तो जिन्दों की तरह रहो, मुर्दों की तरह जिन्दा रहने से क्या फायदा।"

गोदान में बहुत सी बातें कही गई हैं। ऐसा लगता है प्रेमचंद ने अपने संपूर्ण जीवन के व्यंग और विनोद, कसक और वेदना, विद्रोह और वैराग्य, अनुभव और आदर्श् सभी को इसी एक उपन्यास में भर देना चाहा है। कुछ आलाचकों को इसी कारण उसमें अस्तव्यस्तता मिलती है। उसका कथानक शिथिल, अनियंत्रित और स्थान-स्थान पर अति नाटकीय जान पड़ता है। ऊपर से देखने पर है भी ऐसा ही, परंतु सूक्ष्म रूप से देखने पर गोदान में लेखक का अद्भुत उपन्यास-कौशल दिखाई पड़ेगा क्योंकि उन्होंने जितनी बातें कहीं हैं वे सभी समुचित उठान में कहीं गई हैं। प्रेमचंद ने एक स्थान पर लिखा है -
" उपन्यास में आपकी कलम में जितनी शक्ति हो अपना जोर दिखाइए, राजनीति पर तर्क कीजिए, किसी महफिल के वर्णन में १०-२० पृष्ठ लिख डालिए (भाषा सरस होनी चाहिए), कोई दूषण नहीं।"
प्रेमचंद ने गोदान में अपनी कलम का पूरा जोर दिखाया है। सभी बातें कहने के लिये उपयुक्त प्रसंगकल्पना, समुचित तर्कजाल और सही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रवाहशील, चुस्त और दुरुस्त भाषा और वणर्नशैली में उपस्थित कर देना प्रेमचंद का अपना विशेष कौशल है और इस दृष्टि से उनकी तुलना में शायद ही किसी उपन्यास लेखक को रखा जा सकता है।

' गोदान' न सिर्फ प्रेमचंद की सवोत्तम कृति के रूप में आलोचकों द्वारा मानी गयी है, अपितु यह भारतीय भाषाओँ की साहित्यिक पुस्तकों में सर्वाधिक बिक्री के कीर्तिमान भी यह उपन्यास बना चुका है । दुनिया की अनेक भाषाओं में भी इसका अनुवाद हो चुका है । संस्थान की अवधी भाषा की दलील को मानें तो क्या तुलसी का  " राम चरित मानस ' और जायसी का " पद्मावत " जो अवधी में ही है को भी उसके पाठ्यक्रमों से निकाल देना चाहिये ?  पितृपक्ष में मैं इसे गोदान का तर्पण ही कहूँगा । इस उपन्यास पर कुछ भी लिखने से पहले मित्रों से अनुरोध है कि यह उपन्यास और प्रेमचंद की चुनिंदा कहानियाँ पढ़ लें ।
© विजय शंकर सिंह

Tuesday, 5 September 2017

गौरी लंकेश - असहमति पर हत्या / विजय शंकर सिंह

कर्नाटक की #पत्रकार और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश की हत्या आज 5 सितंबर को रात 8 बजे बेंगलुरु स्थित उनके घर मे गोली मार कर,  कर दी गयी । वे लंकेश पत्रिके की संपादक थीं। कन्नड़ लेखक कलबुर्गी के बाद यह दूसरी हत्या है जिसका मोटिव आज़ाद आवाज़ और मुक्त लेखन को खामोश करना है ।  इस कायरतापूर्ण हत्या की निंदा की जाती है  । धर्म और आस्था के नाम पर होने वाली हर हत्या आतंकवाद है । यह प्रवित्ति महामारी की तरह फैलती है और फिर लाइलाज हो जाती है ।

The Hindu अखबार के अनुसार -
" Senior journalist and activist Gauri Lankesh was shot dead at her house in Rajarajeshwari Nagar in Bengaluru late on September 5. City Police Commissioner T. Suneel Kumar confirmed to The Hindu that she was shot dead."

Police sources said Ms. Lankesh collapsed at the entrance of her house after she was shot at by three assailants at around 8 p.m.

इस हत्या पर गिरीश मालवीय की यह फेसबुक पोस्ट पढ़ने लायक है ।
" आज शाम कर्नाटक की वरिष्ठ  महिला पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मार कर हत्या कर दी गयी है , मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शाम करीब साढ़े छह बजे अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक हमलावरों ने उनके घर के दरवाजे पर दस्तक दी और जैसे ही उन्होंने अपने घर का दरवाजा खोला तो अपराधियों ने उनको गोली मार दी

वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश  भाजपा पर एक आर्टिकल लिखा था।जिसके बाद कर्नाटक के धारवाड़ जिले के सांसद प्रह्लाद जोशी और भारतीय जनता पार्टी के नेता उमेश दुशी ने मानहानि का मामला दर्ज करा दिया था।

मानहानि के इन दोनो मामलों में गौरी को अदालत ने छ महीने की सजा और दस हज़ार रूपये का जुर्माना लगाया था लेकिन अदालत ने गौरी लंकेश को उच्च अदालत में अपील करने की अनुमति देते हुए जमानत भी दे दी थी "

यह भी एक अजीब बात है कि, हम रामरहीम, रामपाल और आसाराम जैसों के सामने सर झुकाते हैं और दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी और लंकेश जैसों की हत्या करते है, और खुद को उस महान संस्कृति का वाहक मानते हैं जिसके मूल में ही वाद,  विवाद और संवाद के बीज विद्यमान है । जिसका सारा दर्शन ही सहमति और असहमति के बीच ही निखरता है । तर्कशून्यता, विचार धुंधता और असहमति का भय तथा खीज हिंसा को जन्म देती है ।

मेरी किसी से भी घनघोर असहमति हो सकती है और है भी । किसी की भी सोच और उसकी  विचारधारा से मेरे विचार बिल्कुल जुदा हो सकते हैं और हैं भी। हर किसी को अपने तर्क और बातें अभिव्यक्त करने का उतना ही अधिकार है जितना देश के किसी भी नागरिक को है । घनघोर असहमति, विवाद के बावजूद भी मैं स्वप्न में भी नहीं चाहूंगा कि मेरे विरोधी विचार रखने वाले या मुझसे असहमति रखने वालों की हत्या हो। क्यों कि हत्या न एक जघन्य अपराध और देश के कानून के खिलाफ है बल्कि यह मनुष्य की उस मूल भावना के खिलाफ है जो हमे #मनुर्भव की ओर ले जाती हैं । इस तरह की होने वाली हर कायरतापूर्ण हत्या की निंदा कीजिये और उसके विरोध में खड़े होइये । हत्या कोई भी हो उसकी सराहना नहीं की जानी चाहिये । हत्या का समर्थन करना और उसे जायज़ ठहराना खुद में ही एक कायरतापूर्ण कृत्य है । अपराध और अपराधी सच मे वास्तविक रूप से सर्व निरपेक्ष होते हैं । वे कभी भी किसी को दबोच सकते हैं । धर्म के उन्माद और तद्जन्य हिंसा, अराजकता और बर्बरता का जो नज़ारा हम सीरिया, इराक़, अफगानिस्तान और बर्मा ( म्यामार ) में देख रहे हैं, उस पागलपन से यह महान धर्म और देश बचा रहे यह सबसे अधिक ज़रूरी है । अगर हम सोचते हैं कि अपने वातानुकूलित ख्वाबगाह में हम सब सुरक्षित और हर बला से महफूज हैं तो यह हमारा भ्रम है । गुंडे पालने वालों को मैंने उन्ही गुंडों के हाँथ मरते और बरबाद होते भी देखा है । यह मेरा प्रोफेशनल अनुभव है ।

कर्नाटक के #DGP का बयान आया है कि गौरी ने कभी भी सुरक्षा की मांग या हत्या की आशंका नहीं व्यक्त की थी। लेकिन यह हत्या #बेंगलुरु_पुलिस के लिये एक चुनौती है   उसे हत्यारो को जल्द ही पकड़ना होगा और उन को भी जो इस हत्या के षडयंत्र में शामिल हैं ।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 27 August 2017

डेरा प्रमुख गुरमीत रामरहीम के प्रकरण का तिथिवार विवरण / विजय शंकर सिंह

जब हरियाणा सरकार की व्यापक ' हरियाणा हिंसा के न रोके जाने को ले कर देशव्यापी किरकिरी हो रही है तो सोशल मीडिया पर यह बात फैलाई जा रही है कि इस मामला का  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय उनको लिखे एक गोपनीय पत्र के सम्बंध में तत्कालीन सरकार और पीएमओ द्वारा  संज्ञान लिया गया और इस प्रकार यह बाबा आज सज़ायाफ्ता हुआ । कहा जा रहा है कि उक्त बाबा को जेल भेजे जाने में भाजपा सरकार की सराहनीय भूमिका रही है ।  इस पूरे घटनाक्रम का तिथिवार विवरण इस प्रकार है ।

अप्रैल, 2002 में पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को एक गुमनाम पत्र मिलता है , जिसमे डेरा सच्चा सौदा  सिरसा ,के अंदर महिलाओं के यौन शोषण से जुड़ी घटना का जिक्र किया गया था । उसकी एक प्रति तत्कालीन प्रधानमंत्री जी को भी भेजी गयी थी ।

मई, 2002 में हाई कोर्ट ने उक्त प्रार्थना पत्र को संविधान के अनुच्छेद 226 के आधीन प्राप्त  अधिकारों के अंतर्गत सिरसा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश को जांच के लिये भेजा ।
उन्हें यह आदेश दिया गया कि वे इसमें लगाए गए आरोपों की जांच करें ।

दिसंबर, 2002 में सेशन जज की जांच में तथ्यों की प्रथम दृष्टया पुष्टि होने के कारण हाई कोर्ट ने सीबीआई को मुक़दमा दर्ज कर विवेचना करने का आदेश दिया । मुक़दमा डेरा प्रमुख के खिलाफ यौन शोषण और बलात्कर का कायम हुआ । सेशन जज की प्रारंभिक जांच में इन आरोपों के प्रथम दृष्टया साक्ष्य मिले थे ।

जुलाई, 2007 में सीबीआई ( CBI ) ने आरोपों के सम्बंध में साक्ष्य एकत्र कर आरोप पत्र अंबाला न्यायालय में दायर कर दिया । आरोप पत्र में दो साध्वियों का, डेरा प्रमुख द्वारा 1999 से 2001 तक यौन शोषण और बलात्कर करने के सुबूत दिए गए थे ।

सितम्बर , 2008 में न्यायालय ने अभियुक्त गुरुमीत रामरहीम के खिलाफ धारा 376 और 506 आईपीसी के तहत आरोप तय किये ।
अप्रैल, 2011 तक सीबीआई अदालत अम्बाला में थी जो उसके बाद पंचकूला में स्थानांतरित हो गयी । इसी के साथ ही डेरा प्रमुख के खिलाफ मुक़दमा भी अम्बाला से पंचकूला आ गया ।

जुलाई , 2017 में हाई कोर्ट ने पंचकूला की विशेष अदालत को इस मुक़दमे की दिन प्रतिदिन के आधार पर सुनवायी करने का आदेश दिया ताकि मुक़दमे का निस्तारण शीघ्र हो सके ।

अगस्त, 17 को अभिगोजन और बचाव पक्ष के बयानात और बहस की समाप्ति के बाद 25 अगस्त की तारीख मुक़दमे के फैसले के लिये तय की गयी ।

अगस्त , 25 को अदालत ने डेरा प्रमुख अभियुक्त गुरुमीत रामरहीम को दोषी घोषित किया और सज़ा की तारीख 28 अगस्त तय की ।

सोशल मीडिया पर यह जो  बार बार कहा जा रहा है कि अटल जी की सरकार के समय इस मामले की शिकायत दर्ज हुयी औऱ अब खट्टर सरकार के समय इस का फैसला आया और 10 साल तक ज भी सरकार थी वह सोती रही , आधारहीन है । इस मामले की तार्किक परिणति तक पहुंचाने का श्रेय न्यायपालिका का है । जिसने हर अवसर पर न्याय के लिये अपनी प्रतिबद्धता और संकल्प दिखाया । वस्तुतः जब फैसला आया तो इतने फ़ौज फाटे और सुरक्षा व्यवस्था के बाद भी 35 लोग मारे गए 200 से अधिक घायल हो गए और करोड़ों की सम्पत्ति स्वाहा हो गया । सरकार को जहां सतर्क और सक्षम दिखना था वहां वह बुरी तरह असफल हुयी । इस मामले के असल सूत्रधार पत्रकार क्षत्रपति, वे दोनों साध्वियां और सीबीआई के विवेचक डीएसपी डागर रहे हैं ।

( विजय शंकर सिंह )

Friday, 25 August 2017

एक कविता - त्याग पत्र / विजय शंकर सिंह

सुनो , सुनो, सुनो,
सारी ख़ल्क़ और सारी कायनात,
ज़मीन सुनो और सुनो आसमान,
ईश्वर ने अचानक,
नैतिकता के आधार पर
इस विचित्र दुनिया के
न सुधरे जाने से खिन्न हो
त्यागपत्र दे दिया है !

अब वह कहीं खो गया है
अब वहां कोई नहीं है ।
वीरान पर वह भव्य हवेली,
जहां वह बसता था कभी,
धीरे धीरे
गुंडो , धूर्तों और पाखंडी लोगों की
पनाहगाह बन गयी है ।
अब वहां ' वह ' नहीं रहता है,
वहां रहते हैं,
उनके नाम और चित्रों के आड़ में,
अपनी दूकान चलाने वाले
कुछ लोग ।

ईश्वर ने कहा है,
यह मुनादी सुना दी जाय सबको,
यह पूछने पर कि, आखिर
वह गया कहाँ,
वह है कहाँ ,
वह मिलेगा कब,
वह लौटेगा कब,
खीज कर उसने कहा,
'कोई पूछे तो कह देना,
ईश्वर मर गया है । '

© विजय शंकर सिंह