Saturday, 19 August 2017

एक कविता - पटरी / विजय शंकर सिंह

पटरी पर न रेल है
और न पटरी पर है अर्थ व्यवस्था,
पटरी पर न संविधान की मर्यादा है
और न उनके लोगों की भाषा
पटरी पर न राजनीति के मूल्य हैं
और न लोकतंत्र की विरासत,
पटरी पर खड़ा ,
पटरी के निशान ढूंढ रहा हूँ ,
पटरी उखड़ गयी है या
बहा ले गया सैलाब उसे
आओ उन पटरियों को  बचायें,
जिन पर महफूज़ है,
एक लंबी और नातमान परंपरा,
गंगा की तरह , सब कुछ समेटे,
सतत प्रवाहमान
गं गं गमयति की एक जीवंत धारा !!

© विजय शंकर सिंह

Friday, 18 August 2017

Ghalib - Aagahee, daame shuneedan / आगही दामे शुनॆदन - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

                                                                       

यह चित्र किसी पक्षी का नहीं बल्कि पक्षी जैसे एक खिले हुए पुष्प का है. इस फूल का नाम है, Hebania radiata हर्बैनिया रैडिएटा। )


ग़ालिब -29.
आगही, दामे शुनीदन, जिस कदर चाहे बिछाएं, 
मुद्द'आ अन्का है, अपने आलम ए तकरीर का !!

आगही दामे शुनॆदन - विद्वता से परिपूर्ण और इसका जाल बिछाने वाला. 
अन्का - एक पक्षी जो किसी भी जाल में नहीं फंस सकता है.
आलम ए तक़रीर - कथन का भाव. अभिप्राय.

Aagahee, daame shuneedan, jis kadar chaahe bichhaaye, 
Mudd'aa ankaa hai, apne aalam e takreer kaa !!
-Ghalib. 

मेरी बात सुनने वाला, विद्वता और जानकारी का जितना भी सघन जाल फैलाए, मेरे विचार जो अनका पक्षी की तरह हैं, उसके बिछाए जाल में नहीं फंस सकते हैं. अर्थात कोई कितना भी विद्वान् क्यों न हो मेरी बातों को पूरी तरह से नहीं समझ सकता है. मैं दुरूह हूँ. 

ग़ालिब अक्सर ऊपर से निकल जाते हैं. हम लोग भी बाउंसर गेंद की तरह सिर झुका लेते हैं. निकल जाने देते हैं. यह दुरूहता, जटिलता, और अग्येयता उन्हें सबसे अलग और विशिष्ट भी बना देती है. जब शब्दों और भावों का तिलिस्म टूटता है तो जोअन्दर दिखता है, वह चमत्कृत कर देता है. ग़ालिब के शेरों की सबसे बड़ी यही खूबी है, आप उनके वाक्य विन्यास, शब्द स्थान को इधर उधर नहीं कर सकते. इस से उनके शेरों का मिज़ाज तो बिगड़ता ही है, अर्थ भी प्रदूषित हो जाते हैं. बहुत कम शब्द, पर गागर में सागर का भाव लिए यह उनकी विशिष्ट शैली है. यह शैली फारसी जैसी कलात्मक और समृद्ध भाषा से उनके कलाम में आयी है. 

लेकिन इस शेर का आशय यह भी नहीं है, कि जो वह कहते हैं और लिखते हैं उसे कोई समझ नहीं सकता है. उनका आशय है कि मैं तो बहुत सीधे तौर पर अपनी बात कहता हूँ. कभी कभी ऋजु भी समझ में नहीं आता है. और जब वह ऋजु अलंकार से परिपूर्ण हो तो और मुश्किल है. काव्यशास्त्र ऐसे ही काव्य को क्लासिक कहता है. छंद, अलंकार, आदि उस काव्य को जटिल तो बनाते हैं पर जब वह जटिलता खुलती है तो उसे पढने का आनंद ही और है. किसी भी गोपन या रहस्य का उदघाटन आनंद देता है. मानव प्रज्ञा स्वभावतः अन्वेषी होती है। 
( विजय शंकर सिंह 

18 अगस्त , संस्कृत दिवस - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

आज 18 अगस्त है और आज ही संस्कृत दिवस भी मनाया जाता है । संस्कृत भारतीय वांग्मय की मूल भाषा है और भाषा विज्ञान के दृष्टिकोण से विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है । यह अकेली भाषा है जिसने अपनी व्याकरणीय मर्यादा और शुद्धता बचा कर रखी है । इस लेख में मित्र कुमुद सिंह जी की फेसबुक टाइमलाइन से लिया गया  मिथिला के एक विद्वान भैरव लाल दास द्वारा लिखा गया एक अंश जोड़ा गया  है ।  मिथिला और शास्त्रार्थ की परम्परा बहुत प्राचीन है । मिथिला नरेश जनक जिन्हें विदेह भी कहा जाता है के दरबार ऐसे ज्ञानियों से भरे पड़े रहते थे जो दर्शन के विविध आयामों पर नियमित विचार विमर्श करते थे । उन्हीं में से एक महान तत्वज्ञ अष्टावक्र भी थे ।

महान शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाले आचार्य मण्डन मिश्र भी मिथिला के ही थे। इस जगत प्रसिद्ध शास्त्रार्थ की निर्णायक , आचार्य मण्डन मिश्र की पत्नी आचार्या भारती थी । 5 माह 17 दिन तक चले इस शास्त्रार्थ में अंतिम 21 दिन का शास्रार्थ भारती से हुआ था । इस शास्त्रार्थ में मण्डन मिश्र ने शंकर के सिद्धांतों के आगे हार मान ली । तब भारती ने कहा था,
" आचार्य आप शंकर के मतों का खण्डन नहीं कर पाये । अब आप दंड धारण कर संन्यास ग्रहण करें ।"

भारती तथा शंकराचार्य के बीच संपन्न हुआ शास्त्रार्थ भी ऐतिहासिक था. दोनों के बीच यह शाश्त्रार्थ भी २१ दिन चला, परन्तु 21वें दिन जब भारती को लगा कि अब उसकी पराजय निश्चित है' तब उन्होंने शंकराचार्य से कहा: अब मैं आपसे अंतिम प्रश्न पूछती हूं और इस प्रश्न का भी उत्तर यदि आपने दे दिया तो हम अपने आपको विद्वता में आपसे पराजित मान लूंगी और आपका शिष्यत्व भी स्वीकार कर लूंगी। शंकराचार्य ने प्रश्न पूछने की अनुमति दे दी.
भारती ने शंकराचार्य पूछा:
सम्भोग क्या है ? यह कैसे किया जाता है ? और इससे संतान का निर्माण किस प्रकार हो जाता है ?
भारती के मुख से इन शब्दों को सुनते ही शंकराचार्य प्रश्न की गहरायी समझ गये। यदि वे इसी हालत में और इसी शरीर से भारती के प्रश्न का उत्तर देते हैं तो उनका संन्यास धर्म खन्डित हो जाता। क्योंकि संन्यासी को, बाल बृह्मचारी को संभोग का ज्ञान होना सम्भव ही नहीं है. अतः संन्यास धर्म की रक्षा करने के लिये उत्तर देना सम्भव ही नहीं था और उचित भी नहीं। आदि शंकराचार्य की हार तय थी। लिहाजा दोनों ही तरफ़ से नुकसान था । शंकराचार्य कुछ काल मौन रहे फिर उन्होंने कहा: क्या इस प्रश्न का उत्तर अध्ययन और सुने गये विवरण के आधार पर दे सकता हूं? या इसका उत्तर तभी प्रमाणिक माना जायेगा जबकि उत्तर देने वाला इस प्रक्रिया से व्यवहारिक रूप से गुजर चुका हो।
भारती ने कहा: व्यावहारिक ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान होता है यदि आपने इसका व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया है तो आप निसंदेह उत्तर दे सकते हैं । आदि शंकराचार्य जन्म से ही संन्यासी थे। अतः उनके जीवन में कामकला का व्यावहारिक ज्ञान संन्यास धर्म के सर्वथा विपरीत था। अतः उन्होंने उस वक्त पराजय स्वीकार करते हुये कहा कि मैं इसका उत्तर 6 महीने बाद दूंगा और शंकराचार्य ने मंडन मिश्र की पत्नी से छ्ह माह का समय माँगा।
पर अंततः शंकराचार्य विजयी हुये । यह शंकर की दिग्विजय थी ।

दरभंगा नरेश ने आधुनिक काल में संस्कृत के लिये बहुत कुछ किया है । पहला संस्कृत विश्वविद्यालय उन्होंने ने ही खोला था । उन्होंने अपना महल और समृद्ध संग्रहालय जिसमें एक बड़ा ग्रन्थागार भी था, संस्कृत के लिये दान दे दिया । सबसे प्रसिद्ध संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय है । यह मूलतः एक संस्कृत कॉलेज था जिसे अंग्रेजों ने स्थापित किया था, जो बाद में जब डॉ संपूर्णानंद के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के बाद विश्वविद्यालय बन गया । अब इसका नाम बदल कर डॉ समूर्णानन्द के नाम पर रखा गया है । यह एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है , जो भारत के अतिरिक्त दुनिया के अन्य देशों में भी संस्कृत में प्रमाण पत्र तथा डिग्रियां देता है।

नीचे भैरव लाल दास का लेख प्रस्तुत है ---
'स्वत:प्रमाणं परत:प्रमाणं कीरांगना यत्र गिरागिरन्ति।
द्वारस्थ नीडान्तर-सन्निरुद्धा जानीहि तन्मंडन पण्डितौक:॥''

आज (18 अगस्‍त) संस्‍कृत दिवस है
संस्‍कृत के इस श्‍लोक का उच्‍चारण सुनते ही हमारे मिथिला के पण्डितों के ऑंखों की चमक देखते ही बनती है। तुरंत ही मण्‍डन मिश्र और शंकराचार्य प्रकरण को दुहराने लगते हैं। ऐसा वर्णन करेंगे जैसे शास्‍त्रार्थ के समय 'टिप्‍पणी' लिखने का भार उन्‍हें ही दिया गया हो। मिथिला के गौरव के साथ सबको जोड़ने लगते हैं। प्रकरण तब का है जब शंकराचार्य मिथिला आए, मण्‍डन मिश्र के गांव तक पहुँचे। कुऍं पर पानी भर रही पनभरिनी से पूछा कि मण्‍डन मिश्र का घर कौन सा है। पनिभरिनी ने जवाब दिया-स्‍वत: प्रमाणं परत: प्रमाणं..... लम्‍बा श्‍लोक। अर्थ यह कि जिसके घर के आगे सुग्‍गे संस्‍कृत में उच्‍चारण करते हों, वही मण्‍डन मिश्र का घर है। शंकराचार्य बेसुध हो गए। जिस गांव की पनभरिनी संस्‍कृत बोलती हों, सुग्‍गे भी संस्‍कृत बोलते हों, मण्‍डन मिश्र कैसे होंगे। कहानी आगे भी है। लेकिन संदर्भ यह है कि आज, 18 अगस्‍त को संस्‍कृत दिवस है। पूरे मिथिला में या फिर पूरे बिहार में संस्‍कृत अध्‍ययन-अध्‍यापन की स्थिति अभी बहुत ही गंभीर है। मैं यह नहीं कहता कि संस्‍कृत के विद्वान नहीं हैं, प्राध्‍यापक नहीं है, अनुवादक नहीं हैं लेकिन उनका जुड़ाव आम छात्र से तो बिलकुल ही नहीं है। पटना के तारामंडल के सामने पुणे की संस्‍था वेद-पाठ का आश्रम संचालित करती है, लेकिन पूरे पटना में एक भी ऐसा केन्‍द्र नहीं है जहां संस्‍कृत का सामान्‍य अध्‍ययन किया जा सके। काजीपुर, मन्दिरी आदि जगहों पर अवस्थित पुराने संस्‍कृत पाठशालाओं की स्थिति भी अच्‍छी नहीं है। पटना में रखे ऐसे सैकड़ों संस्‍कृत पाण्‍डुलिपियों की सूची मैंने बनाई है जिनका अनुवाद आज तक नहीं हो सका है। संस्‍कृत देवभाषा है, चार-पांच सौ सालों तक अखंड भारतवर्ष की राजभाषा संस्‍कृत ही रही है। यों तो गुप्‍त काल के बाद ही भारत में केन्‍द्रीय शासन का अंत हो गया लेकिन मुस्लिम एवं औपनिवेशिक शासन में संस्‍कृत भाषा को नाश करने का पूरा-पूरा प्रयत्‍न किया गया। रही सही कसर बाद के समाजवादियों ने कर दी। परोक्ष तौर पर इन नव राजनीतिज्ञों को ब्राह्मण एवं ब्राह्मण व्‍यवस्‍था का विरोध था लेकिन इन लोगों ने संस्‍कृत का विरोध भी जमकर किया। प्रथम एवं द्वितीय संस्‍कृत आयोग के प्रतिवेदनों को पढ़ने से ऐसा लगता है कि संस्‍कृत का प्रचार-प्रसार अब आरंभ ही होनेवाला है लेकिन व्‍यवहार में ऐसा कुछ होनेवाला नहीं है। बिहार में संस्‍कृत (ओरिएंटल) अध्‍ययन के लिए दरभंगा महाराजा ने अपना महल तक दान में दे दिया, अपना पूरा संग्रहालय दे दिया, पाण्‍डुलिपियां दे दीं, उसी विश्‍वविद्यालय के पूर्व कुलपति गबन के आरोप में पुलिस गिरफ्त में हैं। संतोष की बात है कि अब कोई शंकराचार्य बिहार नहीं आएंगे। यहां अब कोई मण्‍डन मिश्र नहीं हैं। यहां के सुग्‍गे और पनिभरिनी संस्‍कृत नहीं बोलती हैं। यहां संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय हैं, महाविद्यालय हैं लेकिन यहां संस्‍कृत पढ़ाई नहीं होती है। विद्वानों को बहुत सारे कार्य हैं। फिर भी हम संस्‍कृत दिवस की चर्चा करते हैं। अभी इतना ही।
साभार – भैरव लाल दास ।

अक्सर संस्कृत को एक मृत भाषा कहा जाता है । यह कहने का आधार यह है कि यह बोलचाल में नहीं है । देश की भाषा समस्या पर विचार करते हुए डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था, कि
" देश की विडंबना है कि, देश में सदैव भाषाओं के दो स्तर रहे हैं । एक राज भाषा और दुसरी जन भाषा । जब संस्कृत राज भाषा थी तो , पालि और प्राकृत जन भाषा रही , मध्यकाल में जब फारसी राज भाषा बनी तो हिंदवी जन भाषा रही । ( इसमें आप क्षेत्रीय भाषायें भी जोड़ सकते हैं । ) अंग्रेज़ी जब राजभाषा हुयी तो हिंदी जन भाषा ही बनी रही । "
यहां राज भाषा का अर्थ संविधान में वर्णित राजभाषा से नहीं है बल्कि सरकार की भाषा से है । आज भी जो हिंदी सरकारी कागजों में लिखी जाती है वह आम जन में बोली नहीं जाती है ।

संस्कृत कोई धार्मिक भाषा नहीं है। कोई भाषा धार्मिक भाषा नहीं होती है । धर्म ज़रूर उस भाषा के माध्यम से जन तक पहुंचता है । संस्कृत साहित्य , साहित्य के सभी विधाओं में प्रचुर और समृद्ध है । वाल्मीकि और व्यास जैसे पुरा विद्वानों को अगर छोड़ भी दें तो कालिदास, भास्, मम्मट, कल्हण, शूद्रक आदि नाम किसी भी भाषा के साहित्य के नामों से कमतर नहीं है । यह अलग बात है कि हम इसी भ्रम में जी रहे हैं कि यह भाषा पंडो और पुजारियों की ही भाषा है । यह भाषा, अपनी संप्रेषणीयता, भाव वहन क्षमता, ऊर्जस्विता में दुनिया की श्रेष्टतम भाषाओं में से एक है । आज देश में 16 संस्कृत विश्वविद्यालय और भारत सरकार की संस्कृत अकादमी सहित अनेक राज्यों में संस्कृत अकादमियां भी है । यह सभी संस्कृत के उन्नयन और विकास हेतु तत्पर हैं ।
संस्कृत दिवस की शुभकामनायें !!

( विजय शंकर सिंह )

Thursday, 17 August 2017

एक कविता - खामोशी / विजय शंकर सिंह



तुम जब खामोशी ओढ़ लेते हो ,
और भी गूढ़ और जटिल हो जाते हो,
अनानास के पके फल की तरह,
जटिल और कठोर छिलके लिए ,
पर, अंदर भरे, 
रस और नरम गूदे से भरपूर,
मीठा और पौष्टिक !
कोई अंदर पैठे कैसे ,
कैसे उतरे कोई भीतर,
स्वाद पाये कहाँ से,
माधुर्य और मृदुता का।
तुम्ही सुलझा पाओ तो सुलझाओ ,
मैं तो मुंतज़िर हूँ 
अब तुम्ही कुछ कहो , तो कहो !!

( विजय शंकर सिंह )

स्वतंत्रता दिवस 2017 के अवसर पर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का भाषण जिसे दूरदर्शन और प्रसार भारती ने प्रसारित करने से मना कर दिया था / विजय शंकर सिंह


इस अवसर पर त्रिपुरा के मुख्य मंत्री #माणिक_सरकार_ ने ध्वजारोहण के बाद उपस्थित समूह को औपचारिक रूप से सम्बोधित किया । माणिक सरकार का यह भाषण दूरदर्शन और प्रसार भारती ने प्रदर्शित और प्रसारित करने से मना कर दिया । हद तो तब हो गयी जब दूरदर्शन और प्रसार भारती ने उस भाषण में संशोधन करने का सुझाव दिया । आपातकाल और क्या होता है यह आप तय करते रहिये । पर मेरी राय में आपात काल लागू न होते हुये भी यह मनोवृत्ति आपात काल की ही है , जब एक मुख्य मंत्री को अपना उद्बोधन संशोधित करने के लिये कहा जाय । यह अशनि संकेत है ।
नीचे उनके भाषण की फ़ोटो प्रति जो सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी के एक ट्वीट से लिया गया है, और उसका हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत कर रहा हूँ । इन्हें कृपया पढ़ें और स्वयं तय करें कि यह भाषण अपने शब्द और भावना में देश के किस कानून का उल्लंघन कर रहा है । फिर भी यदि भारत सरकार को यह लगता है कि यह किसी कानून का उल्लंघन है तो वह खुल कर माणिक सरकार के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करे न कि दूरदर्शन और प्रसार भारती के  बल पर अपने अहं की तुष्टि करे ।
********
                                                                                 
त्रिपुरा के प्रियजनो,
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आप सबका अभिनंदन और सबको शुभकामनाएं । मैं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के शहीदों की अमर स्मृतियोंको श्रद्धांजलि देता हूँ । उन स्वतंत्रता सेनानियों में जो आज भी हमारे बीच मौजूद है उन सबके प्रति अपनी आंतरिक श्रद्धा व्यक्त करता हूँ ।
स्वतंत्रता दिवस को मनाना कोई आनुष्ठानिक काम भर नहीं है । इसके ऐतिहासिक महत्व और इस दिन के साथ जुड़ी भारतवासियों की गहरी भावनाओं के चलतेइसे राष्ट्रीय आत्म - निरीक्षण के एक महत्वपूर्ण उत्सव के तौर पर मनाया जाना चाहिए ।
इस स्वतंत्रता दिवसके मौक़े पर हमारे सामने कुछ अत्यंत प्रासंगिक, महत्वपूर्ण और समसामयिक प्रश्न उपस्थित हैं । विविधता में एकता भारत की परंपरागत विरासत है । धर्म निरपेक्षता के महान मूल्यों ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट बनाये रखा है । लेकिन आज धर्म-निरपेक्षता की इसी भावना पर आघात किये जा रहे हैं । हमारे समाज में अवांछित जटिलताएँ और दरारें पैदा करने के षड़यंत्र और प्रयत्न किये जा रहे हैं ; धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर, भारत को एक खास धर्म पर आधारित देश में बदलने तथा गाय की रक्षा खाके नाम पर उत्तेजना फैला कर हमारी राष्ट्रीय चेतना पर हमला किया जा रहा है । इनके कारण अल्प-संख्यक और दलित समुदाय के लोगों पर भारी हमले हो रहे हैं । उनके बीच सुरक्षा का भाव ख़त्म हो रहा है । उनके जीवन में भारी कष्ट हैं । इन नापाक रुझानों को कोई स्थान नहीं दिया जा सकता है, न बर्दाश्त किया जा सकता है । ये विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के उद्देश्यों, स्वप्नों और आदर्शों के विरुद्ध हैं । जिन्होंने कभी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, उल्टे उसमें भीतरघात किया, जो अत्याचारी और निर्दयी अंग्रेज़ लुटेरों के सहयोगी थे और राष्ट्र-विरोधी ताक़तों से मिले हुए थे,, उनके अनुयायी अभी विभिन्न नामों और रंगों की ओट में भारत की एकता और अखंडता पर चोट कर रहे हैं ।प्रत्येक वफ़ादार और देशभक्त भारतवासी के आज एकजुट भारत के लिये और इन विध्वंसक साज़िशों और हमलों को परस्त करने के लिये शपथ लेनी चाहिए ।
हम सबको मिल कर संयुक्त रूप में अल्प-संख्यकों, दलितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने और देश की एकता और अखंडता को बनाये रखने की कोशिश करनी चाहिए ।
आज ग़रीबों और अमीरों के बीतता फर्क तेज़ी से बढ़ रहा है । मुट्ठी भर लोगों के हाथ में राष्ट्र के विशाल संसाधान और संपदा सिमट रहे हैं । आबादी का विशाल हिस्सा ग़रीब है । ये लोग अमानवीय शोषण के शिकार हैं । उनके पास न भोजन है, न घर, न कपड़ें, न शिक्षा, न चिकित्सा और न निश्चित आय के रोजगार की सुरक्षा । यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के लक्ष्यों और उद्देश्यों के विपरीत है । इन परिस्थितियों के लिये हमारी आज की राष्ट्रीय नीतियाँ सीधे ज़िम्मेदार हैं । इन जन-विरोधी नीतियों को ख़त्म करना होगा । लेकिन यह काम सिर्फ बातों से नहीं हो सकता ।  इसके लिये वंचित और पीड़ित जनों को जागना होगा, आवाज उठानी होगी, और निर्भय हो कर सामूहिक रूप से बिना थके प्रतिवाद करना होगा । हमारे पास निश्चित तौर पर ऐसी वैकल्पक नीति होनी चाहिए जो भारत के अधिकांश लोगों के हितों की सेवा कर सके । इस वैकल्पिक नीति को रूपायित करने के लिये वंचित, पीड़ित भारतवासियों को इस स्वतंत्रता दिवस पर एकजुट होकर एक व्यापक आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन शुरू करने की प्रतिज्ञा करनी होगी ।
बेरोज़गारी की बढ़ती हुई समस्या ने हमारे राष्ट्रीय मनोविज्ञान में निराशा और हताशा के भाव को पैदा किया है । एक ओर लाखों लोग अपना रोजगार गँवा रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों बेरोज़गार नौजवान काम की प्रतीक्षा में हैं, जो उनके लिये मृग मरीचिका की तरह है । राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों को बिना बदले इस विकराल समस्या का समाधान संभव नहीं है । यह नीति मुट्ठी भर मुनाफ़ाख़ोर कारपोरेट के स्वार्थ को साधती है । भारत की आम जनता की क्रय शक्ति में कोई वृद्धि नहीं हो रही है । इसीलिये इस स्वतंत्रता दिवस पर छात्रों, नौजवानों और मेहनतकशों को इन विनाशकारी नीतियों को बदलने के लिये सामूहिक और लगातार आंदोलन छेड़ने का प्रण करना होगा ।

                                                                                  

केंद्र की सरकार की जन-विरोधी नीतियों की तुलना में त्रिपुरा की सरकार अपनी सीमाओं के बावजूद दबे-कुचले लोगों के उत्थान पर विशेष ध्यान देते हुए सभी लोगों के कल्याण की नीतियों पर चल रही है । यह एक पूरी तरह से भिन्न और वैकल्पिक रास्ता है । इस रास्ते ने न सिर्फ त्रिपुरा की जनता को आकर्षित किया है बल्कि  देश भर के दबे हुए लोगों में सकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है । त्रिपुरा में प्रतिक्रियावादीमताकतों को यह सहन नहीं हो रहा है । इसीलिये शांति, भाईचारे और राज्य की अखंडता को प्रभावित करने के लिये जनता के दुश्मन एक के बाद एक साज़िशें रच रहे हैं । विकास के कामों को बाधित करने की भी कोशिश चल रही है । इन नापाक इरादों का हमें मुक़ाबला करना होगा और प्रतिक्रियावादियों ताक़तों को अलग-थलग करना होगा । इसी पृष्ठभूमि में, स्वतंत्रता दिवस पर, त्रिपुरा के सभी शुभ बुद्धिसंपन्न, शांतिप्रिय और विकासकामी लोगों को इन विभाजनकारी ताक़तों के खिलाफ आगे आने और एकजुट होकर काम करने का संकल्प लेना होगा ।
********
भाजपा के लगभग सभी बड़े नेता आपातकाल के दंश से परिचित हैं । वे सभी कारावास का दंड भी भोग चुके हैं । इनका पितृ संगठन आरएसएस भी उस अवधि की पीड़ा को अनुभव कर चुका है । फिर भी अगर इस प्रकार की मनोवृत्ति सरकार के दिमाग में उपजती है तो इसके लिये मेरे पास बस एक ही वाक्य है कि, निरंकुश बनती सत्ता का चरित्र एक ही होता है, ठस, अहमन्य, ज़िद्दी और अहंकारी । यह मनोवृत्ति ही #फासिज़्म है ।
( विजय शंकर सिंह )

Wednesday, 16 August 2017

एक लघु कविता - रिसता हुआ झूठ / विजय शंकर सिंह

ऊंची जगहों से रिसता हुआ झूठ,
नीचे नगर में फैल कर,
एक सड़ांध मारता ,
कीचड़ पैदा कर देता है ।
उसी बजबजाते और
बदबू मारते कीचड़ में लिपटे पांव,
और ऊपर दूर कहीं आसमान में
इन सब से बेफिक्र हो
घूमता हुआ चांद ,
कितना खूबसूुरत लगता है न !

( विजय शंकर सिंह )

Tuesday, 15 August 2017

अली सरदार जाफरी की आज़ादी पर एक नज़्म / विजय शंकर सिंह

6आज आज़ादी जी सत्तरवीं सालगिरह है। आज देश आजाद हुआ था । एक विदेशी हुक़ूमत से , एक साम्राज्यवादी ताक़त से । इस पर बहुत सी कविताए लिखी गयीं हैंं । बहुत से शेर पढ़े गए हैं । नज़्में लिखी गयीं हैं। सरहद के पार भी और सरहद के आर भी कलमकार लिखते रहे और पढ़ते रहे । ऐसी ही एक खूबसुरत और मानीखेज़ नज़्म #अली_सरदार_जाफरी_ ने भी लिखी है । यह आज़ादी की सबसे बड़ी त्रासदी बंटवारे पर है । उस भयानक त्रासदी पर बहुत कुछ लिखा गया है। यह नज़्म पढ़ें । आप को ज़रूर पसंद आएगी ।

*******
गुलाम तुम भी थे यारों गुलाम हम भी थे
नहा के खून में आई थी फसल-ए-आज़ादी
मज़ा तो तब था कि मिलकर इलाज-ए-जां करते
खुद अपने हाथ से तामीर-ए-गुलिस्तां करते
हमारे दर्द में तुम और तुम्हारे दर्द में हम शरीक होते
कुछ जश्न-ए-आशियाँ करते .
तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बरदोश
हम आयें सुबह-ए-बनारस की रौशनी लेकर
और उसके बाद ये पूछें
कौन दुश्मन है
-अली सरदार जाफ़री

********
#अली_सरदार_जाफरी_
'मेरा सफर' और 'सरहद' समेत अनेक कृतियों से उर्दू साहित्य को समृद्ध बनाने वाले अली सरदार जाफरी का नाम उर्दू अदब के महानतम शायरों में शुमार किया जाता है। उन्होंने अपने लेखन का सफर शायरी से नहीं बल्कि कथा लेखन से किया था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अली सरदार जाफरी का जन्म 1 अगस्त 1913 को उत्तरप्रदेश के बलरामपुर में हुआ।1933 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और इसी दौरान वे कम्युनिस्ट विचारधारा के संपर्क में आए। उन्हें 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। बाद में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा पूरी की।
लघु कथाओं का पहला संग्रह 'मंजिल' नाम से वर्ष 1938 में प्रकाशित हुआ। शुरुआत में वे हाजिन के नाम से लेखन किया करते थे, लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने इस नाम को त्याग दिया।

जाफरी प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े रहे। वे कई अन्य सामाजिक, राजनैतिक और साहित्यिक आंदोलनों से भी जुड़े रहे। जाफरी ने जलजला, धरती के लाल (1946) और परदेसी (1957) जैसी फिल्मों में गीत लेखन भी किया। वर्ष 1948 से 1978 के बीच उनका नई दुनिया को सलाम (1948) खून की लकीर, अमन का सितारा, एशिया जाग उठा, पत्थर की दीवार, एक ख्वाब और पैरहन-ए-शरार और लहू पुकारता है जैसे संग्रह प्रकाशित हुए। इसके अलावा उन्होंने मेरा सफर जैसी प्रसिद्ध रचना का भी लेखन किया। उनका आखिरी संग्रह सरहद के नाम से प्रकाशित हुआ। वर्ष 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा के दौरान उन्होंने इसका लेखन किया था।

इन को वर्ष 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे फिराक गोरखपुरी और कुर्तुल एन हैदर के साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले उर्दू के तीसरे साहित्यकार हैं। उन्हें वर्ष 1967 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे उत्तरप्रदेश सरकार के उर्दू अकादमी पुरस्कार और मध्यप्रदेश सरकार के इकबाल सम्मान से भी सम्मानित हुए। उनकी कई रचनाओं का भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। जाफरी का एक अगस्त 2000 को निधन हो गया।

( विजय शंकर सिंह )
15/08/2017.