Wednesday, 18 October 2017

राम लौट आये हैं - अयोध्या में दीपावली / विजय शंकर सिंह

राम लौट आये हैं । 14 साल के बनवास के बाद जंगल की खट्टी मीठी स्मृतियों के साथ । रावण का वध कर । सीता और लक्ष्मण के साथ । साथ मे परम सेवक हनुमान भी है । कहते हैं राजा राम के लौटने की प्रसन्नता से अभिभूत हो अयोध्या वासियों ने असंख्य दीप जला कर उनका स्वागत किया था । राम ने गद्दी संभाली । उनकी पादुका हटा दी गयी । वे सीता के साथ उसी राज सिंहासन पर विराजमान हो गए । एक युग का अंत हुआ । वह पादुका का युग था । प्रॉक्सी काल था । सत्ता किसी और की थी, आदेश किसी और का चलता था । लेकिन यह व्यवस्था भी सहमति से थी। पादुका प्रतीक्षारत थी। आज उस पादुका को चरण मिल गए ।  रघुकुल के सबसे प्रतापी राजा का शासन प्रारम्भ हुआ । असँख्य दीप जल उठे । अंधकार सरयू पार चला गया । राजधानी से दूर उन गाँव गिरांव मे जहां वह प्रजा भी बसती थी, जो कोउ नृप होहि, की मानसिकता में जी रही थी। कम ओ बेश वह मानसिकता आज भी है । पर राजधानी उत्सव मग्न थी। यह उत्सवधर्मिता थी । उत्सवधर्मिता हमारे समाज का एक स्थायी भाव है । वसन्त के आगमन से ले कर शरद के प्रस्थान तक पर्व और उत्सवों की एक समृद्ध परंपरा है । आनन्द , भारतीय मानसिकता का स्थायी भाव है । दीया बाती, धूम धड़ाका, आदि यह सब,  तिमिर को दूर करने का यह एक प्रतीकात्मक उपक्रम ही तो है । अंधकार से एक अहर्निश युद्ध होता रहता है हम सबका । यह अंदर बाहर दोनों जगह चलता रहता है । अंतर यह है कि अंदर का संघर्ष कोई देख नहीं पाता है । कुछ देख भी पाते हैं तो अनदेखी कर जाते हैं ।  राजा , तिमिर का नाश करता है । वह एक व्यवस्था देता है । शासन की रीति -नीति, विधि - विधान बनाता है । उसी विधि -विधान पर राज्य चलता है । वह प्रजा का हित देखता है । प्रजा का सुख देखता है । प्रजा को प्रसन्न रखता है । प्रजा का रंजन करता है,  इसीलिए तो, उसे प्रजा का रंजक कहा गया है । प्रजा उसके लिये पाल्य है । अतः वह प्रजा पालक भी कहा गया है । पालन आप भेदभाव की भावना से ऊपर उठ कर ही कर सकते हैं । वह यह सुनिश्चित करता है कि उसके राज्य में दैहिक दैविक और भौतिक ताप न व्यापे। किसी को कोई कष्ट न हो । उसका शासन, उस की इच्छा पर निर्भर नही  करता था, वह स्वेच्छाचारी नहीं होता था । यह राजा का दायित्व है कि वह समभाव से शासन करे । उसके राजदण्ड पर धर्म का अंकुश रहता है । धर्मोअस्मि धर्मोअस्मि । धर्म से यहां तात्पर्य कर्मकांड से संक्रमित धर्म नही  है बल्कि उस विधान से है जो राज करने के लिये बनाये गए है । जो अनुभव और परम्पराओं की अग्नि में तप कर कुंदन बने हो। राजा जिस दिन इस राजधर्म से च्युत हो जाता है वह नर्क का भागी होता है । अत्याचारी राजा को राज्यच्युत करना भी शास्त्र सम्मत है ।

राजधर्म, इतिहास का पुनर्मचंन, पुनर्लेखन, और उत्सवधर्मिता ही नहीं है बल्कि प्रजा के कष्टों को दूर करते हुये एक व्यवस्थित शासन प्रणाली का मनसा वाचा कर्मणा पालन भी है । पर्व तो एक प्रतीक है । अंधेरा भी एक प्रतीक ही है । निशा है तो, अंधकार रहेगा ही। और फिर निशा भी अमावस की। उदास और काली रात ।  उसी अंधकार को दूर करने के लिये तो दीप जलाते हैं हम । हम सूरज की आभा में दीप कभी नहीं जलाते हैं। जलाते भी हैं तो उसका उद्देश्य अंधेरे को भगाना नहीं रहता है । क्यों कि अंधकार रहता ही नहीं है । दीप की आवश्यकता ही अंधकार में पड़ती है । उसका प्रकाश उस अंधेरे में सम्बल देता है, इसी लिये तो हम सबको आह्लादित करता है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि अंधकार कितना भी सघन हो वह प्रकाश की एक रेख से डर जाता है । डर भी एक प्रकार का अंधेरा ही है । अंधकार का एक प्रतीक भय, भूख और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं भी है । जब हम इन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के जद्दोजहद से मुक्त होते हैं तो शुभकामनाओं का आदान प्रदान भी मन से निकलता है नहीं तो वह केवल शुष्क औपचारिकता ही बन जाती है । राजा का सबसे बड़ा दायित्व और कर्तव्य प्रजा को सुखी , सुरक्षित और भयमुक्त रखना है । ऐसे राजधर्म से च्युत राजा को नरक में ही शरण मिलती है । तभी तो आध्यात्म रामायण के एक प्रसंग के अनुसार राम वशिष्ठ से कहते हैं, " गुरुवर, राज्य करना सबसे कठिन कार्य है । " प्रजा की अपेक्षाओं को पूरा करना आसान नहीं होता है । इसी लिये राम इसे कठिन कहते हैं । मानस में तुलसीदास की यह बात भी सुनें,
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप होहिं नरक अधिकारी ।।
राम राज्य क्या है, इस पर तुलसी की यह चौपाइयां पढ़ें ।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
तुलसी के बिना राम की और राम के बिना तुलसी की कल्पना नहीं की जा सकती है ।

राम राज्य अक्सर सर्वश्रेष्ठ राज माना जाता है । यह इतना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है कि इसे आप काल्पनिक आदर्शवाद यूटोपिया भी कह सकते हैं । यह आदर्श की चरम स्थिति है । हम एक सुंदर , व्यवस्थित और सुखी राज्य की जब कामना करते हैं तो राम राज्य का ही नाम मस्तिष्क में उभरता है । कभी कभी इसके विपरीत स्वच्छंद राज व्यवस्था को भी परिहास में राम राज्य कह देते हैं। पर राम राज्य से अर्थ एक सुंदर सुशासित राज्य ही है। जहां अपराध कम से कम हो, और हो तो अपराधी दंडित हो, सबकी उदर पूर्ति हो , शिक्षा चिकित्सा की सुविधा हो और प्रजा भयमुक्त हो । यह दीप जो उस दिन जले थे जन आशा के दीप थे । वह एक राजा का अपनी राजधानी में लौटने पर किया गया स्वागत तो था ही साथ ही आशा के भी दीप थे , कि अब अंधेरा छंटेगा और सुखकर शासन आएगा । शासन कितना भी सुखकर हो, वह अंतिम नहीं होता है । बेहतर की गुंजाइश और कामना सदैव जन्मती रहती है । यह कामना और इच्छा भाव ही संसार को चलाती रहती हैं । आज भी जो दीप वहां जले हैं, उसे इसी प्रतीक के रूप में देखें कि अब थोड़ा बेहतर शासन आएगा। आये या न आये पर एक आस रखने का अधिकार तो हम सबको है । कल क्या होगा यह राम ही बता पायें तो बताएं पर जब हम एक दीप उम्मीदों का जलाते हैं और उसे सरिता में प्रवाहित करते हैं और उसे समय के साथ ही बहते हुये देखते हैं तो जो प्रवाहभाव मन में उमगता है वही जीवन का सार होता है । नदी के प्रवाह में बहते हुये दीप उम्मीदों के दिये ही तो हैं ।  आशा के ये असंख्य दीप जो आज जगमग जगमग हुए हैं वे एक बेहतर कल की उम्मीदें पूरी करें । यही कामना है ।

© विजय शंकर सिंह

Monday, 16 October 2017

ताजमहल और साझी संस्कृति पर प्रियदर्शन का एक लेख / विजय शंकर सिंह

साझी विरासत पर यह एक सुंदर लेख है । जिसे लिखा है प्रिय दर्शन ने । यह लेख संगीत सोम के ताजमहल के सम्बन्ध में कहे गये वाक्य कि ताज हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है , पर लिखा गया है ।

नज़रिया: ताजमहल के साथ क्या-क्या छोड़ेंगे संगीत सोम ?
( प्रिय दर्शन )

कुछ देर के लिए संगीत सोम का तर्क मान लें और ताजमहल को अपने इतिहास से ख़ारिज करने को तैयार हो जाएं. लेकिन उसके पहले या बाद उन्हें कितनी चीज़ों को ख़ारिज करना होगा ?

संगीत सोम को कुर्ता-पायजामा पहनना छोड़ना होगा, क्योंकि ये सिले हुए कपड़े भी गद्दारों की देन है- धोती और उत्तरीय में रहना होगा.

इतना ही नहीं, चाय का भी त्याग करना होगा. चाय उन चीनियों की दी हुई है जो देश के ज़्यादा बड़े दुश्मन हैं. उन्होंने हमारा एक हिस्सा हड़प रखा है, दूसरे हिस्से पर दावा करते हैं और पाकिस्तान के मददगार हैं. उनकी वजह से हम मौलाना मसूद अज़हर को आतंकी घोषित नहीं करवा पा रहे.

अच्छा हो, वे समोसा और गुलाब जामुन खाना भी छोड़ दें- ये सब उन्हीं इलाकों से आए हैं जहां से भारत में पहली बार मुसलमान आए हैं. ऐसे बहुत सारे व्यंजन है जो ईरान-फ़ारस और पश्चिम एशिया के रास्ते भारत आए. बहुत सारे फूलों, फलों और शाक-सब्ज़ियों की दास्तान भी यही है.

दुश्मनों की लिस्ट में अंग्रेज क्यों नहीं?

लेकिन अगर दुश्मन ही चुनने हों तो चीन और पाकिस्तान क्यों, अंग्रेज़ क्यों नहीं, जिन्होंने 200 साल हम पर शासन किया और हमें ऐसा गुलाम बनाया कि हमारा सारा रहन-सहन बदल गया? और अंग्रेजी सामान का बहिष्कार तो गांधी जी ने भी किया था.

हालांकि यह कुछ मुश्किल है, लेकिन ठेठ और पक्की भारतीयता के लिए इतनी तो शर्त माननी होगी. पूरी आधुनिक तकनीक को विदा करना होगा.

ब्रश और पेस्ट जैसे पश्चिमी सामान छोड़कर नीम या करंज के दतवन का सहारा लें, तरह-तरह के साबुन छोड़ बदन पर मिट्टी लगाएं, और चाय की जगह दूध पिएं- और ख़याल रखें कि यह देसी गाय का हो, जर्सी गाय का नहीं. भोजन का विशेष खयाल रखें. बाहर निकलें तो बैलगाड़ी से.

और निकल कर कहां जाएंगे? जिस संसद भवन में उनके साथी बैठते हैं वह भी अत्याचारी अंग्रेज़ों का बनवाया हुआ है. सरधाना से दिल्ली तक जिस रास्ते वे आते हैं, वह रास्ता किसका बनवाया हुआ है, कभी सोचा है?

कहते हैं, देश को जोड़ने वाली सबसे बड़ी सड़क भी एक अफग़ान गद्दार ने बनाई थी जिसका नाम शेरशाह सूरी था. बाद में उसे अंग्रेज़ों ने ग्रैंड ट्रंक रोड का नाम दिया?

और अपने हिंदू होने का क्या करेंगे संगीत सोम?

यह 'हिंदू' शब्द भी बाहर से आया है. आप सनातनी, वैष्णव, शैव. शाक्त कुछ भी रहे हों, आपको हिंदू तो मुसलमानों ने ही बनाया.

हिंदू छोड़िए, उस हिंदी का क्या करेंगे जो दरअसल अपने मूल में उर्दू से ही बनी है? संगीत सोम के अपने नाम में बहुत सांगीतिकता भी है और वैदिकता भी, लेकिन वह वैसी हिंदी कम से कम इस जन्म में तो नहीं बोल पाएंगे जिसमें पूरी तरह उर्दू और फ़ारसी शब्द निषिद्ध हों?

तुलसी की रामचरितमानस से उर्दू के शब्द कैसे हटाएंगे? तुलसी एक ही पद में तीन बार राम को ग़रीबनवाज़ कहते हैं. क्या संगीत सोम की हिम्मत है कि वे ग़रीबनवाज़ को बदल कर दरिद्रनारायण कर डालें?

वैसे 'दरिद्र नारायण' नाम से एक बहुत सुंदर कहानी राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह ने लिखी है- उसका गद्य अनूठा है, इसलिए कि उसमें उर्दू की छौंक बहुत प्यारी है. और प्रेमचंद का क्या करेंगे संगीत सोम? और मुगले आज़म और पाकीज़ा जैसी यादगार फिल्मों का? ग़ालिब और मीर को भी हटा देंगे?

तुलसी, तानसेन और ताजमहल ।

क्या संगीत सोम ने किसी रामविलास शर्मा का नाम सुना है? हिंदी के बहुत बड़े आदमी रहे रामविलास शर्मा. उन्होंने मध्यकाल के तीन शिखर माने हैं- तुलसी, तानसेन और ताजमहल. क्या इस विरासत को संगीत सोम मिटा पाएंगे?

मामला कुछ ज़्यादा संगीन होता लग रहा है. हो सकता है, इन नामों से हमारे नेता परिचित ही न हों. लेकिन इतना तो वे समझ सकते हैं कि भारत एक देश नहीं, एक पूरी सभ्यता है. इस सभ्यता को बहुत सारी नदियों और समंदरों के पानी ने सींचा है. हमारे भीतर यह भूमंडलीय तरावट इतनी पुरानी है कि हर तरह की कट्टरता आकर यहां शरमा जाती है, कुछ बदल जाती है.

उस नई कट्टरता को छोड़कर जो इस पूरी विरासत को नकारने पर तुली है- जिसे अपने अलावा हर दूसरा गद्दार या दुश्मन नज़र आता है. सारी दुनिया जब बहुत सारी कट्टरताओं के विरुद्ध एक बड़ी लड़ाई लड़ रही है तो हमारे यहां कट्टरता के ये नए पैरोकार हैं जो दिखा रहे हैं कि हम भी उनसे कम नहीं.

ताजमहल की सबसे तीखी आलोचना अगर किसी ने की तो वह भी एक 'गद्दार' था.

साहिर लुधियानवी ने लिखा,
'एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक'

यानी ताजमहल और शाहजहां और किसी और की भी आलोचना हो सकती है. आलोचना हमें बताती है कि हम अपनी परंपरा को किस तरह- या किस-किस तरह से देख सकते हैं.

और ताजमहल के बारे में सबसे मार्मिक ढंग से अगर किसी ने लिखा तो वह भारत के पहले नोबेल सम्मान विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर थे. गुरुदेव ने ताज को काल के कपोल पर लुढ़की हुई आंसू की बूंद कहा था. साहिर और टैगोर की ये अलग-अलग दृष्टियां बताती हैं कि सुंदरता और सृजन को देखने के कितने ढंग हो सकते हैं.

इस परंपरा के बीच ही हमारा खाना-पीना, ओढ़ना-बिछाना, सोना, हंसना-गाना, रोना और जीना बना है. इसी से भारतीयता बनी है- उसके अलग-अलग तत्व कई बार में आपस में बुरी तरह झगड़ पड़ते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से इस तरह बंधे हैं कि जैसे लगता है कि अलग होंगे तो अर्थहीन और बेमानी हो जाएंगे.

लेकिन संगीत सोम का वास्ता न सुंदरता से है, न सृजन से है, न परंपरा से है और न सभ्यता से- वे बस एक ऐसी नफ़रत के नुमाइंदे हैं जिनकी आंख पर पट्टी बंधी हुई है, ऐसे संगीत सोम जैसे नेता धूल में मिल जाएंगे, ताजमहल बना रहेगा.

( साभार BBC )
- विजय शंकर सिंह

शरद जोशी की एक व्यंग्य रचना - आलोचना / विजय शंकर सिंह

शरद जोशी' ( 1931 - 1991 ) हिन्दी जगत के प्रमुख वयंग्यकार थे । शरद जोशी का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में २१ मई १९३१ को हुआ था । यह कुछ समय तक यह सरकारी नौकरी में रहे, फिर इन्होंने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया।

आरम्भ में कुछ कहानियाँ लिखीं, फिर पूरी तरह व्यंग्य-लेखन ही करने लगे। इन्होंने व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। हिन्दी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने प्रमुख व्यंग्यकारों में शरद जोशी भी एक हैं। इनकी रचनाओं में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण मिलता है।

यह लेख आलोचना पर है । आलोचना से अक्सर लोग यह सामान्य अर्थ निकालते हैं की निंदा की जा रही। आलोचना, निंदा नहीं है , यह कथ्य या व्यक्ति को देखना है । शरद जोशी ने इस लेख में इस शब्द की रोचक व्याख्या की है। उनके अनुसार आलोचना शब्द , संस्कृत की लुच धातु से निकला है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार हर शब्द किसी न किसी मूल से उद्भूत होता है । लुच शब्द का अर्थ देखना होता है । लुच्चा शब्द इसी से विकसित हुआ है ।
उनका यह रोचक निबंध पढ़ें।

आलोचना
( शरद जोशी )

'लेखक विद्वान हो न हो, आलोचक सदैव विद्वान होता है। विद्वान प्रायः भौंडी बेतुकी बात कह बैठता है। ऐसी बातों से साहित्य में स्थापनाएँ होती हैं। उस स्थापना की सड़ांध से वातावरण बनता है जिसमें कविताएँ पनपती हैं। सो, कुछ भी कहो, आलोचक आदमी काम का है।' आज से आठ वर्ष पूर्व आलोचना पर अपने मित्रों के समूह में बोलते हुए यह विचार मैंने प्रकट किए थे। वे पत्थर की लकीर हैं। लेखक का साहित्य के विकास में महत्व है या नहीं है यह विवादास्पद विषय हो सकता है पर किसी साहित्यिक के विकास में किसी आलोचक का महत्व सर्वस्वीकृत है। साहित्य की वैतरणी तरना हो तो किसी आलोचक गैया की पूँछ पकड़ो, फिर सींग चलाने का काम उसका और यश बटोरने का काम कमलमुख का।

आलोचना के प्रति अपनी प्राइवेट राय जाहिर करने के पूर्व मैं आपको यह बताऊँ कि आलोचना है क्या? यह प्रश्न मुझसे अकसर पूछा जाता है। साहित्य रत्न की छात्राएँ चूँकि आलोचना समझने को सबसे ज्यादा उत्सुक दिखाई देती हैं इसलिए यह मानना गलत न होगा कि आलोचना साहित्य की सबसे टेढ़ी खीर है। टेढ़ी खीर इसलिए कि मैं कभी इसका ठीक उत्तर नहीं दे पाता। मैं मुस्कराकर उन लड़कियों को कनखियों से देखकर कह देता हूँ, 'यह किसी आलोचक से पूछिए, मैं तो कलाकार हूँ।'

खैर, विषय पर आ जाऊँ। आलोचना शब्द लुच् धातु से बना है जिसका अर्थ है देखना। लुच् धातु से ही बना है लुच्चा। आलोचक के स्थान पर आलुच्चा या सिर्फ लुच्चा शब्द हिंदी में खप सकता है। मैंने एक बार खपाने की कोशिश भी की थी, एक सुप्रसिद्ध आलोचक महोदय को सभा में परिचित कराते समय पिछली जनवरी में वातावरण बहुत बिगड़ा। मुझे इस शब्द के पक्ष में भयंकर संघर्ष करना पड़ा। आलोचक महोदय ने कहा कि आप शब्द वापस लीजिए। जनता ने भी मुझे चारों ओर से घेर लिया। मुझे पहली बार यह अनुभव हुआ कि हिंदी भाषा में नया शब्द देना कितना खतरा मोल लेना है। मैंने कहा, मैं शब्द वापस लेता हूँ। पर आप यह भूलिए नहीं कि आलोचना शब्द 'लुच' धातु से बना है।

अस्तु, बात आई गई हो गई। मैंने इस विषय में सोचना और चर्चा करना बंद सा कर दिया। पर यह गुत्थी मन में हमेशा बनी रही कि आलोचक का दायित्व क्या है? वास्तव में साहित्य के विशाल गोदाम में घुसकर बेकार माल की छँटाई करना और अच्छे माल को शो-केस में रखवाना आलोचक का काम माना गया है, जिसे वह करता नहीं। वह इस चक्कर में रहता है कि अपने परिचितों और पंथ वालों का माल रहने दें, बाकी सबका फिंकवा दें। यह शुभ प्रवृत्ति है और आज नहीं तो कल इसके लाभ नजर आते हैं। कोशिश करते रहना समीक्षक का धर्म है। जैसे हिंदी में अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि मैथिलीशरण गुप्त, निराला और कविवर कमलमुख में कौन सर्वश्रेष्ठ है। एक राष्ट्रकवि है। एक बहुप्रशंसित है और तीसरे से बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं।

समीक्षकों के इस उत्तरदायित्वहीन मूड के बावजूद पिछला दशक हिंदी आलोचना का स्वर्णयुग था। जितनी पुस्तकें प्रकाशित नहीं हुईं उनसे अधिक आलोचकों को सादर भेंट प्राप्त हुई हैं। कुछ पुस्तकों का संपूर्ण संस्करण ही आलोचकों को सादर भेंट करने में समाप्त हो गया। समीक्षा की नई भाषा, नई शैली का विकास पिछले दशक में हुआ है। (दशक की ही चर्चा कर रहा हूँ क्योंकि मेरे आलोचक व्यक्तित्व का कँटीला विकास भी इसी दशक में हुआ है)। हिंदी का मैदान उस समय तक सूना था जब तक आलोचना की इस खंजर शब्दावली का जन्म नहीं हुआ था। इस शब्दावली के विशेषज्ञों का प्रकाशक की दुकान पर बड़ा स्वागत होते देखा है। प्रकाशक आलोचक पालते हैं और यदि इस क्षेत्र में मेरा जरा भी नाम हुआ तो विश्वास रखिए, किसी प्रकाशक से मेरा लाभ का सिलसिला जम जाएगा।

मैंने अपने आलोचक जीवन के शैशव काल में कतिपय प्रचलित शब्दावली, मुहावरावली और वाक्यावली का अनूठा संकलन किया था जिसे आज भी जब-तब उपयोग करता रहता हूँ। किसी पुस्तक के समर्थन तथा विरोध में किस प्रकार के वाक्य लिखे जाने चाहिए, उसके कतिपय थर्ड क्लास नमूने उदाहरणार्थ यहाँ दे रहा हूँ। अच्छे उदाहरण इस कारण नहीं दे रहा हूँ कि हमारे अनेक समीक्षक उसका उपयोग शुरू कर देंगे।

समर्थन की बातें

इस दृष्टि से रचना बेजोड़ है (दृष्टि कोई भी हो)। रचना में छुपा हुआ निष्कलुष वात्सल्य, निश्छल अभिव्यक्ति मन को छूती है।

छपाई, सफाई विशेष आकर्षक है।

रूप और भावों के साथ जो विचारों के प्रतीक उभरते हैं, उससे कवि की शक्ति व संभावनाओं के प्रति आस्था बनती है।

कमलमुख की कलम चूम लेने को जी चाहता है। (दत्तू पानवाला की, यह मेरे विषय में व्यक्त राय देते हुए संकोच उत्पन्न हो रहा है परंतु उनके विशेष आग्रह को टाल भी तो नहीं सकता)।

मनोगुंफों की तहों में इतना गहरा घुसने वाला कलाकार हिंदी उपन्यास ने दूसरा पैदा नहीं किया।

आपने प्रेमचंद की परंपरा को बढ़ाया है। मैं यदि यह कहूँ कि आप दूसरे प्रेमचंद हैं तो गलती नहीं करता।

कहानी में संगीतात्मकता के कारण उसी आनंद की मधुर सृष्टि होती है जो गीतों में पत्रकारिता से हो सकती है।

विरोध की बातें
कविता न कहकर इसे असमर्थ गद्य कहना ठीक होगा। भावांकन में शून्यता है और भाषा बिखर गई है।
छपाई, सफाई तथा प्रूफ संबंधी इतनी भूलें खटकने वाली हैं।
लेख कोर्स के लिए लिखा लगता है।
रचना इस यशसिद्ध लेखक के प्रति हमें निराश करती है। ऐसी पुस्तक का अभाव जितना खटकता था, प्रकाशन उससे अधिक अखरता है।
संतुलन और संगठन के अभाव ने अच्छी भाषा के बावजूद रचना को घटिया बना दिया है।
लेखक त्रिशंकु-सा लगता है - आक्रोशजन्य विवेकशून्यता में हाथ पैर मारता हुआ।
इन निष्प्राण रचनाओं में कवि का निरा फ्रस्ट्रेशन उभरकर आ गया है।
पूर्वग्रह ग्रसित दृष्टिकोण, पस्तहिम्मत, प्रतिक्रियाग्रस्त की तड़पन व घृणा, शब्द चमत्कार से कागज काला करने की छिछली शक्ति का थोथा प्रदर्शन ही होता है इन कविताओं में।
स्वयं लेखक की दमित, कुंठित वासना की भोंडी अभिव्यक्ति यत्र तत्र ही नहीं, सर्वत्र है।
सामाजिकता से यह अनास्था लेखक को कहाँ ले जाएगी। जबकि मूल्य अधिक है पुस्तक का।
ये वे सरल लटके-खटके हैं जिनसे किसी पुस्तक को उछाला जा सकता है, गिराया जा सकता है।
आलोचना से महत्वपूर्ण प्रश्न है आलोचक व्यक्तित्व का। पुस्तक और उसका लेखक तो बहाना या माध्यम मात्र है जिसके सहारे आलोचक यश अर्जित करता है। प्रसिद्धि का पथ साफ खुला है। स्वयं पुस्तक लिखकर नाम कमाइए अथवा दूसरे की पुस्तक पर विचार व्यक्त कर नाम कमाइए। बल्कि कड़ी आलोचना करने से मौलिक लेखक से अधिक यश प्राप्त होता है।
इस संदर्भ में मुझे एक वार्तालाप याद आता है जो साहित्यरत्न की छात्रा और मेरे बीच हुआ था -
रात के दस बजे / गहरी ठंड / पार्क की बेंच / वह और मैं / तारों जड़ा आकाश / घुप्प एकांत लुभावना।
वह - 'आलोचना मेरी समझ में नहीं आती सर।'
मैं - 'हाय सुलोचना, इसका अर्थ है तुझमें असीम प्रतिभा है। सृजन की प्रचुर शक्ति है। महान लेखकों को आलोचना कभी समझ में नहीं आती।'
वह - 'आप आलोचना क्यों करते हैं?'
मैं - 'और नहीं तो क्या करूँ। दूसरे की आलोचना का पात्र बनने से बेहतर है मैं स्वयं आलोचक बन जाऊँ।'
वह - 'किसी की आलोचना करने से आपको क्या मिलता है?'
मैं - 'उसकी पुस्तक।'
कुछ देर चुप्पी रही।
वह - 'सच कहें सर, आपको मेरे गले की कसम, झूठ बोलें तो मेरा मरा मुँह देखें। आलोचना का मापदंड क्या है? समीक्षक का उत्तरदायित्व आप कैसे निभाते हैं?'

उस रात सुलोचना के कोमल हाथ अपने हाथों में ले पाए बिना भी मैंने सच-सच कह दिया - 'सुलोचना! आलोचना का मापदंड परिस्थितियों के साथ बदलता है। समूचा हिंदी जगत तीन भागों में बँटा है। मेरे मित्र, मेरे शत्रु और तीसरा वह भाग जो मेरे से अपरिचित है। सबसे बड़ा यही, तीसरा भाग है। यदि मित्र की पुस्तक हो तो उसके गुण गाने होते हैं। सुरक्षा करता हूँ। शत्रु की पुस्तक के लिए छीछालेदर की शब्दावली लेकर गिरा देता हूँ। और तीसरे वर्ग की पुस्तक बिना पढ़े ही, बिना आलोचना के निबटा देता हूँ या कभी-कभी कुछ सफे पढ़ लेता हूँ। अपने प्रकाशक ने यदि किसी लेखक की पुस्तक छापी हो तो उसकी प्रशंसा करनी होती है ताकि कुछ बिक विक जाए। जिस पत्रिका में आलोचना देनी हो उसके गुट का खयाल करना पड़ता है। रेडियो के प्रोड्यूसर, पत्रों के संपादक तथा हिंदी विभाग के अध्यक्ष आलोचना के पात्र नहीं होते। सुलोचना, सच कहता हूँ, प्रयोगवादी धारा का अदना-सा उम्मीदवार हूँ। अतः हर प्रगतिशील बनने वाले लेखक के खिलाफ लिखना धर्म समझता हूँ। फिर भी मैं कुछ नहीं हूँ। मुश्किल से एक-दो पुस्तक साल में समीक्षार्थ मेरे पास आती है बस... बस इतना ही।'

(सुलोचना ने बाद में बताया उस रात मेरी आँखों में आँसू छलछला आए थे।)
( विजय शंकर सिंह )