Tuesday, 23 January 2018

फ़िल्म पद्मावत पर विवाद - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

याद कीजिये सीबीएफसी ने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्युमेंट्री को । उस डॉक्युमेंट्री में कहे गए, एक शब्द के कारण उसे प्रमाणपत्र देने से रोक दिया था। बाद में जब बोर्ड बदला तभी वह फ़िल्म पास हुयी। तब सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष थे फिल्मकार पहलाज निहलानी। जिन्होंने खुद को सार्वजनिक रूप से पीएम मोदी जी का चमचा कहा था और इस पर उन्हें गर्व भी था। पर वही चमचा बाद में सेंसर बोर्ड से हटा दिया गया। सरकार बिना रीढ़ की हड्डी के नौकरशाह तो पसंद करती है पर वह यह भी चाहती है कि दिखावे के लिये ही सही रीढ़ की हड्डी की जगह कुछ न कुछ रीढ़ जैसी चीज दिखे। उसके बाद आये प्रसून जोशी। एक प्रतिभावान कवि और फिल्मों से जुड़ी शख्सियत हैं ये। इन्होंने फ़िल्म पदमावती देखी, कुछ कट सुझाये और फिर उसे पद्मावत के नए नाम से संस्कारित कर के प्रदर्शन हेतु प्रमाणपत्र दे दिया। 

क्या सरकार सेंसर बोर्ड के इस प्रमाण पत्र के बाद फ़िल्म के प्रदर्शन पर कोई रोक नहीं लगा सकती है ? यह कहा जा रहा है कि नहीं। 

मेरा कहना है कि अगर सरकार को यह समाधान हो जाय कि किसी भी दृश्य श्रव्य से व्यापक हिंसा होने की संभावना है तो वह कानून व्यवस्था के विंदु पर रोक लगा सकती है। कानून में इसका स्पष्ट प्राविधान है। लेकिन सरकार का इरादा और उसे ऐसा समाधान हो जाय तब ।

आज फ़िल्म का विरोध करने वाले सोशल मीडिया पर खुल कर हिंसा करने आत्महत्या करने और अराजकता फैलाने के लिये उकसा रहे हैं। सारा आक्रोश और गुस्सा, आगजनी आदि इस ठंड में रजाई में बैठे बैठे ही हो रही है। यह मैं अच्छी तरह अनुमान लगा सकता हूँ कि इन उकसाने वालों में से बहुत कम ही लोगों के बच्चे आग लगाने के लिये सड़क पर निकलेंगे। यह अलग बात है कि किसी के बरगलाने पर आसामाजिक तत्वों के साथ कुछ मासूम क्षत्रिय युवा निकल आये। और फिर हिंसा में शामिल होने का खामियाजा साल दर साल भुगतते रहें।

अगर फ़िल्म में इतिहास से छेड़छाड़ हुयी है, और स्वाभिमान तथा बलिदानी प्रतीकों को भले ही उनकी ऐतिहासिकता पर कोई संदेह हो तो भी सरकार को यह सोचना चाहिये कि यदि यह समाज के एक वर्ग को आहत कर सकती है तो उसे सेंसर बोर्ड द्वारा पास किये जाने पर भी कानून व्यवस्था के व्यापक हित मे रिलीज करने पर पुनर्विचार कर सकती है। सिनेमाघरों के मालिकों, फ़िल्म के कलाकारों का विरोध और उनको मार डालने तथा आग लगा देने की धमकी आदि आदि बचकानी बातें है। 

सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सिर्टीफिकेशन, कोई संवैधानिक संस्था नहीं है बल्कि यह भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का ही एक हिस्सा है। सरकार व्यापक जनहित में इसे निर्देश दे सकती है, और देती भी है। सेंसर बोर्ड यह आकलन नहीं करता है कि फ़िल्म का जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उसके पास कोई भी ऐसा तंत्र नहीँ है और न ही उसके पास कोई खुफिया एजेंसी है जिस से वह जनता की नब्ज भांप सके। वह केवल यह देखता है कि फ़िल्म सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु उपयुक्त है या नहीँ। वह कोई इतिहास मर्मज्ञों का पैनल नही है। सरकार को अगर यह सूचनाएं मिल रही है कि देश मे व्यापक हिंसा हो सकती है तो वह अब इस प्रकरण में दखल दे सकती है। 

अब एक नज़र करणी सेना और उन संगठनों पर जो स्वाभिमान और आन बान शान पर इसे हमला मान कर आक्रोशित हैं । इन संगठनों ने कितने गरीब क्षत्रिय युवाओं के शिक्षा, रोज़गार, और गरीब क्षत्रिय कन्याओं के विवाह आदि के सवाल पर इतना हंगामा मचाया है करणी सेना तथा उसके समर्थकों ने जितना आज वे एक फ़िल्म के रिलीज होने पर मचा रहे हैं ? हिंसा के लिये खुलेआम उकसाना एक संज्ञेय अपराध है। और जब हिंसा होगी तो यह सारे आन बान शान वाले तथाकथित नेता पीछे हो जाएंगे और इन सब के चक्कर मे फंस जाएंगे वे क्षत्रिय लड़के जो भीड़ में या तो भावना के ज्वार में बह कर आ रहे हैं या बरगला कर लाये गये हैं। फिर वे और उनके घरवाले थाना पुलिस और अदालत का चक्कर काटते रह जाएंगे। इनमे से एक भी करणी सेना या अन्य संगठन के लोग उनके साथ खड़े नहीं दिखेंगे। रिश्तेदार या गांव घर के लोग भले रहें। फिर शुरू होगा सालों साल मुकदमेबाजी का दारुण सिलसिला। रहा सवाल हिंसा कर के झुकाने का तो मेरा यह कहना है कि हिंसा से कोई सरकार नही डरती है। उसके पास हिंसा से निपटने के लिये अधिक हिंसक सामान है। वह अपने आधार के दरकने से डरती है। जिस दिन उसे लगेगा कि उसके साथ के लोग उससे हट रहे, उनकी पार्टी छोड़ कर दूर जा रहे हैं वह तुरन्त इस मामले पर गम्भीर हो जाएगी और आक्रोशित पक्ष से बात करने लगेगी । सरकार ऐसी धमकियों को बंदर घुड़की ही समझती है।  यह मेरा अनुभव है। 

अगर सच मे करणी सेना इस फ़िल्म को क्षत्रिय अस्मिता और स्वाभिमान पर एक प्रहार मानती है और उसका विरोध करना चाहती है तो वह उन सभी क्षत्रिय जन प्रतिनिधिगण को, जो संसद और विधान सभाओं में हैं, यह निर्देश दे कि वे सरकार को यह अल्टीमेटम दें कि, या तो इस फ़िल्म के रिलीज की तारीख के फैसले पर पुनर्विचार किया जाय नहीं तो वे सरकार से खुद को अलग कर लेंगे। कानून व्यवस्था के विंदु पर सरकार चाहे तो इस पर पुनर्विचार कर सकती है। प्रोड्यूसर को रिलीज की तारीख स्थगित करने के लिये कहा जा सकता है। अभिसूचना और पुलिस से कानून व्यवस्था पर रपट भी मांगी जा सकती है। पर यदि इरादा सच मे फ़िल्म से उत्पन्न राजपूत समाज मे व्याप्त आक्रोश के प्रति सरकार की सहानुभूति हो तब । अगर केवल आग लगाऊ नीति और अनावश्यक मुद्दों में भटकाने की चाल हो तो और बात है। 

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 21 January 2018

वीआई लेनिन के बारे में राजा महेंद्र प्रताप का एक संस्मरण / विजय शंकर सिंह

वीआई लेनिन, विश्व के सर्वप्रथम समाजवादी क्रांति के महानायक थे। वे रूस की जारशाही और सामन्तवाद के विरुद्ध उठी जनक्रांति के सूत्रधार थे। उनका निधन 21 जनवरी 1924 को रूस के गोर्की नामक स्थान पर हुआ था। उनकी आज पुण्यतिथि है। इस महान क्रांतिकारी और सिद्धांतकार समाजवादी योद्धा को उनके पुण्यतिथि पर विनम्र स्मरण ।

मथुरा से जब आप हाथरस की ओर चलेंगे तो हाथरस जिले में प्रवेश करते ही एक कस्बा पड़ेगा मुरसान । मुरसान एक छोटा सा कस्बा है। वहां के राजा थे राजा महेंद्र प्रताप सिंह। राजा महेंद्र प्रताप उन विलक्षण और प्रतिभाशाली स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में से एक रहे हैं जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारत के बाहर आज़ादी की मशाल और स्वतंत्र चेतना को जगाये रखा। उनका जन्म 1 दिसंबर 1896 को और म्रत्यु 29 अप्रैल 1979 को हुयी थी। वे मथुरा से आज़ादी के बाद सांसद भी रहे हैं । वे स्वाधीनता संग्राम के सेनानी के साथ साथ पत्रकार, लेखक और समाज सुधारक भी थे। मुरसान एक छोटी सी रियासत रही है ।

राजा महेंद्र प्रताप प्रथम विश्व युद्ध के समय यूरोप में ही थे। उस समय वे रूस भी गए थे और वर्ष 1919 में उनकी मुलाकात लेनिन से हुई थी। वे जर्मनी से रूस जा कर लेनिन से मिले थे। अपनी इस मुलाकात का जिक्र उन्होंने स्वयं किया है । उनकी मुलाकात का संस्मरण मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
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कॉमरेड लैनिन के साथ मेरी मुलाकात

यह 1919 की कहानी है। मैं जर्मनी से, रूस वापस आ गया था। मैं पूर्व शुगर-राजा ( रूस के जार के अधीन एक सामन्त ) के महल की इमारत पर रहा। मौलाना बरकातुल्ला ( ये भी क्रांतिकारी आंदोलन में राजा महेंद्र प्रताप के साथ थे ) इस स्थान पर अपने मुख्यालय की स्थापना करना चाहते हैं। उनका रूसी विदेश कार्यालय के साथ बहुत अच्छा संबंध था । जब मैं वहां था तो शहर में भोजन की कमी थी। और हम सब सच मे तंगी में थे। मेरे भारतीय मित्रों ने इस यात्रा के लिये धन और साधन एकत्र किया था। जो बर्लिन से यहां आने पर मुझे मिलना था।

एक शाम को हमें सोवियत विदेश कार्यालय से फ़ोन कॉल मिला। मुझे बताया गया कि विदेश मंत्रालय से कोई व्यक्ति आ रहा है और मुझे अपनी पुस्तकों को उस आदमी को सौंप देना है। मैंने ऐसा ही किया । अगली सुबह वह दिन आया जब मैं अपने दोस्तों के साथ क्रेमलिन में कॉमरेड लेनिन से मिलने गया। प्रोफेसर वोसेंसस्की जो लेनिन के सहयोगी थे , हमें मास्को के प्राचीन इम्पीरियल पैलेस में ले गये । हमें सुरक्षा गार्ड के माध्यम से यह बताया गया कि हम ऊपर चले जायें।  हमने एक बड़े कमरे में प्रवेश किया 'जिसमें एक बड़ी मेज थी। कमरे में प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता कॉमरेड लेनिन बैठे हुये थे। मैं सरकार के मुखिया ( राजा महेन्द्र प्रताप ने 1 जनवरी 1915 में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना प्रवास , Government in exile , में ही की थी , वे खुद को राष्ट्रपति और मौलाना बरकुतल्लाह खान को प्रधान मंत्री घोषित कर चुके थे। यह सरकार काबुल , अफगानिस्तान में घोषित की गयी थी ) होने के कारण पहले कमरे में प्रवेश किया। तब मेरे समक्ष बैठा व्यक्ति या नायक अचानक खड़ा हो गया, और एक कोने में जाकर मेरे बैठने के लिये एक छोटी सी कुर्सी लाया।  और उसे अपनी कुर्सी के पास रखा। जब मैं उसके पास आया तो उसने मुस्कुरा कर मुझ से बैठने के लिए कहा। एक पल के लिए मैंने सोचा था कि, कहाँ बैठना है, क्या मुझे खुद श्री लेनिन द्वारा लायी गयी इस छोटी कुर्सी पर बैठना चाहिए या कमरे में ही रखी मोरक्को के चमड़े से ढकने वाली विशाल कुर्सियों में से किसी भी एक पर बैठना चाहिए। वे कुर्सियां दूर रखी थीं। लेकिन लेनिन ने जो कुर्सी मेरे लिये लायी थी, वह एक साधारण सी कुर्सी थी। मुझे बैठने के लिये कमरे में और भी कुर्सियाँ थीं। पर मैं अचंभित था कि लेनिन ने खुद ही मेरे लिये उठ कर एक कुर्सी उठायी और उसे अपनी कुर्सी के पास रख। मैं उस छोटी सी कुर्सी पर जिसे लेनिन खुद ही उठा कर लाये थे, बैठ गया, जबकि मेरे दोस्त, मौलाना बरकातुल्लाह और मेरे साथ आये अन्य साथियों ने बड़े पैमाने पर रखी बड़ी कुर्सियों पर अपना स्थान ग्रहण किया। लेनिन खुद एक साधारण और छोटी कुर्सी पर बैठे थे।

कॉमरेड लेनिन ने मुझसे पूछा, मुझे किस भाषा में संबोधित करना था- अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन या रूसी । मैंने उन्हें बताया कि हम अंग्रेजी में बेहतर बोल और समझ सकते है । मैंने उन्हें भारतीय इतिहास से जुड़ी कुछ पुस्तके दीं। मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कहा कि वह पहले से ही इसे पढ़ चुके हैं। मैं देखा कि एक दिन पहले विदेश मंत्रालय द्वारा मांगे जाने वाले पर्चे और पुस्तिकाएं लेनिन ने खुद के लिए मंगाये थे। उन पर उन्होंने कुछ निशान भी लगाए थे। निश्चित ही रूप से लेनिन ने उन्हें पढ़ा होगा। लेनिन का अध्ययन बहुत गम्भीर और व्यापक था। लेनिन ने मेरी किताब "टॉल्स्टॉयविम" की चर्चा की। उन्होंने टॉलस्टॉय, पुश्किन, गोर्की आदि पर बहुत मंजे हुये साहित्य के आलोचक के समान चर्चा की। फिर बातें मार्क्सवाद, सर्वहारा की क्रांति से लेते हुये नवजात रूसी सरकार और जनता के लिये गेहूं, चावल, मक्खन, तेल, कोयले आदि जैसे आवश्यक वस्तुओं के सम्बंध में बात हुयी । लेनिन का ज्ञान और मेधाशक्ति व्यापक थी। वे एक एक छोटी सी छोटी चीज पर भी अपनी पैनी नज़र रखते थे। हमने काफी समय तक बातचीत की। भारत मे ब्रिटेन के राज्य के अलावा किसान  और उद्योगों में मज़दूरों की स्थिति पर भी बात हुई।

इस साक्षात्कार के बाद विदेशी कार्यालय ने फैसला किया कि मुझे अफगानिस्तान में पहले रूसी राजदूत श्री सुरिट्स के साथ जाना चाहिए। क्यों कि मेरी सरकार का मुख्यालय काबुल था। मैं रूस के समर्थन हेतु कॉमरेड लेनिन से मिलने गया था। लेकिन मुझे इस मिशन में बहुत सफलता नही  मिली। मेरा काम अमानुल्लाह खान को रूसी राजदूत सुरिट्स से परिचय कराना था। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध मे इंग्लैंड के विजयी होने और रूस की स्थिति भी बहुत मजबूत न होने के कारण हम अपने लक्ष्य में बहुत आगे नहीं बढ़ सके । उस समय रूस में नयी नयी क्रांति हुई थी और रूस अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा था। लेनिन ऐसी स्थिति में थे ही नही  कि ब्रिटेन के ताक़त के सामने मेरी कोई मदद कर सकें। पर मैं लेनिन की प्रतिभा, जुझारूपन, अध्ययन स्पष्टता और सादगी से बहुत ही प्रभावित हुआ।
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© विजय शंकर सिंह

एक कविता - मौन / विजय शंकर सिंह

एक आदमी चाय बेचता है,
एक आदमी पकौड़े तलता है,
एक आदमी और है,
जिसे न चाय मिलती है,
और न पकौड़ा,
बस हसरत भरी निगाह से,
कभी चाय तो कभी पकौड़े को
देखते बैठे रहता है ।
मैं पूछता हूँ, यह कौन है,
मेरे देश की मीडिया मौन है !!

© विजय शंकर सिंह

Friday, 19 January 2018

फ़िल्म पद्मावत का विरोध - एक प्रतिक्रिया / विजय शंकर सिंह

करणी सेना ने पद्मावत की रिलीज पर कहा है कि यह राजपूती अस्मिता का प्रश्न है, राजपूत महिलाएं पुनः जौहर करेंगी।

यह बात मेरी समझ से बाहर है कि अस्मिता को बचाने के लिये जौहर भी अस्मिता को ही करना पड़ेगा ! राजपूतों ने महिलाओं की आड़ ले कर तो कभी युद्ध नहीं किया और जौहर भी तब हुआ जब यह निश्चित हो गया कि अब कोई भी पुरुष राजपूत योद्धा खेत होने से शेष नहीं रहेगा । तब महिलाओं ने आत्मसम्मान को बचाने के लिये स्वयं को अग्नि को सपर्पित कर दिया । जौहर अगर हुआ भी है तो वह अपवाद स्वरूप ही हुआ है। यह कोई परम्परा का अंग नहीं था।

पर आज न तो कोई युद्ध हो रहा है और न ही महिलाओं के आत्मसम्मान पर कोई मध्ययुगीन  संकट आया है। एक फ़िल्म है जो कल्पना और इतिहास का घालमेल है। प्रोड्यूसर कहता है यह जायसी के महाकाव्य पद्मावत पर आधारित है और अफवाह यह है कि यह एक इतिहास का विकृति करण है। इस फ़िल्म में यह कहा जा रहा है कि कुछ दृश्य जो चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी से जुड़े हैं इतिहास के विरुद्ध हैं और जैसे फिल्माए गए हैं उन से राजपूती अस्मिता आहत होती है। फ़िल्म करणी सेना ने देखी है या नहीं यह तो नहीं पता पर जिन पत्रकारों ने देखी है उन्होंने इसे आपात्तिजनक नहीं बताया। फिर इस फ़िल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सिर्टीफिकेशन #CBFC ने देखा और कुछ संशोधन सुझाये तथा इन संशोधनों के बाद को U/A प्रमाणपत्र जारी किया।

फिर शुरू हुआ राजनीतिक खेल। पहले राजस्थान फिर गुजरात, फिर मध्य प्रदेश और हरियाणा ने इसका दिखाया जाना प्रतिबंधित किया। यह चारो सरकारें एक ही दल भाजपा की है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट गया। सुप्रीम कोर्ट में यह संवैधानिक नुक्ता रखा गया कि किसी भी राज्य सरकार को फ़िल्म का प्रदर्शन रोकने का अधिकार संघीय ढांचे के विरुद्ध है। राज्य सरकारों ने कहा कि कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इस पर कोर्ट का कहना है कि कानून व्यवस्था बनी रहे यह सरकार का प्रथम दायित्व है। अब फ़िल्म 25 जनवरी को रिलीज होगी।

25 जनवरी , फ़िल्म की रिलीज़ की तिथि को ले कर फेसबुक पर ' फूंक डालूंगा,' ' जला दूँगा ' ' काट दूंगा' ' मार दूंगा '  जैसी पोस्ट्स की भरमार है और यह प्रतिक्रिया मेरे विचार से  बचकानी है। फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद ही पता लगेगा कि यह फ़िल्म अस्मिता को कितनी आहत करती है। अगर सचमुच में कोई गम्भीर ऐतिहासिक भूल संदर्भ से हट कर इस फ़िल्म में की गयी है तो फिर उसका भी समाधान निकाला जा सकता है और तब फ़िल्म रोकी जा सकती है। लेकिन, फ़िल्म में अगर कुछ भी आपात्तिजनक नहीं है तब तो यह सारी प्रतिक्रियाएं अपरिपक्व औऱ मूर्खतापूर्ण प्रलाप ही लगेंगी। फ़िलहाल तो स्थिति यही है कि फ़िल्म का प्रदर्शन तो होगा ही।

आज जौहर करेगा कौन ? वे कौन सी वीरांगनायें हैं जो आज जौहर की ज्वाला में कूदने जा रही हैं ? उनके पति किस युद्ध मे युयुत्सु भाव से गये हैं ? और अब वे ज़ीवित नहीं लौटने या जीत कर ही आने का संकल्प ले कर गये हैं?  वे क्या सिनेमा हॉल को ही युद्ध का मैदान समझ कर तलवार भांजने गये हैं ? दर असल यह जौहर का मज़ाक़ बनाना हुआ ।

जौहर का यह मूर्खतापूर्ण प्रलाप आत्मदाह के लिये महिलाओं को उकसाना है और यह एक संज्ञेय अपराध है। जो भी व्यक्ति और समाज अस्मिता के मिथ्याभिमान में जौहर यानी आग में कूद कर आत्मदाह ( आत्महत्या, खुदकुशी ) कर लेने की बात करता है उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिये। यह एक प्रकार से अराजकता फैलाना है। इक्कीसवीं वीं सदी की आवश्यकताएं, प्रतिमान, इच्छाएं और लक्ष्य आदि आदि अलग होते हैं। हमें उनके अनुसार बदलना होगा। हम 13 वीं सदी के मिथ्याभिमान में जी कर उस मानसिकता से उन्नति नहीं कर सकते हैं। अतीत पर गर्व करना और बात है पर उस से चिपके रहना मूढ़ता है।  हमें आगे बढ़ना है। हमें चलते रहना है। चरैवेति चरैवेति !!

© विजय शंकर सिंह

Thursday, 18 January 2018

सआदत हसन मंटो और उनकी एक कहानी - मूत्री / विजय शंकर सिंह

कांग्रस हाऊस और जिन्नाह हाल से थोड़े ही फ़ासले पर एक पेशाब गाह है जिसे बंबई में “मूत्री” कहते हैं। आस पास के महलों की सारी ग़लाज़त इस तअफ़्फ़ुन भरी कोठड़ी के बाहर ढेरियों की सूरत में पड़ी रहती है। इस क़दर बद-बू होती है कि आदमियों को नाक पर रूमाल रख कर बाज़ार से गुज़रना पड़ता है।
इस मूत्री में दफ़ा उसे मजबूरन जाना पड़ा........ पेशाब करने के लिए नाक पर रूमाल रख कर, सांस बंद कर के, वो बद-बूओं के इस मस्कन में दाख़िल हुआ फ़र्श पर ग़लाज़त बुलबुले बन कर फट रही थी........ दीवारों पर आज़ा-ए-तनासुल की मुहीब तस्वीरें बनी थीं........ सामने कोइले के साथ किसी ने ये अल्फ़ाज़ लिखे हुए थे:
“मुस्लमानों की बहन का पाकिस्तान मारा”
इन अल्फ़ाज़ ने बद-बू की शिद्दत और भी ज़्यादा कर दी। वो जल्दी जल्दी बाहर निकल आया।
जिन्नाह हाल और कांग्रस हाऊस दोनों पर गर्वनमैंट का क़बज़ा है। लेकिन थोड़े ही फ़ासले पर जो मूत्री है, इसी तरह आज़ाद है।
अपनी ग़लाज़तें और उफ़ूनतें फैलाने के लिए........ आस पास के महलों का कूड़ा करकट अब कुछ ज़्यादा ही ढेरियों की सूरत में बाहर पड़ा दिखाई देता है।
एक बार फिर उसे मजबूरन इस मूत्री में जाना पड़ा। ज़ाहिर है कि पेशाब करने के लिए। नाक पर रूमाल रख कर और सांस बंद कर के वो बद-बूओं के इस घर में दाख़िल हुआ........फ़र्श पर पतले पाख़ाने की पपड़ियां जम रही थीं। दीवारों पर इंसान के औलाद पैदा करने वाले आज़ा की तादाद में इज़ाफ़ा हो गया था........
“मुस्लमान की बहन का पाकिस्तान मारा” के नीचे किसी ने मोटी पैंसिल से ये घिनौनी अल्फ़ाज़ तहरीर किए हुए थे।
“हिंदुओं की माँ का अखंड हिंदूस्तान मारा”
इस तहरीर ने मूत्री की बद-बू में एक तेज़ाबी कैफ़ियत पैदा कर दी........ वो जल्दी जल्दी बाहर निकल आया।
महात्मा गांधी की ग़ैर मशरूत रिहाई हुई। जिन्नाह को पंजाब में शिकस्त हुई। जिन्नाह हाल और कांग्रस हाऊस दोनों को शिकस्त हुई न रिहाई। उन पर गर्वनमैंट का और उस के थोड़े ही फ़ासले पर जो मूत्री है उस पर बद-बू का क़ब्ज़ा जारी रहा........ आस पास के महलों का कूड़ा करकट अब एक ढेर की सूरत में बाहर पड़ा रहता है।
तीसरी बार फिर उसे इस मूत्री में जाना पड़ा........पेशाब करने के लिए नहीं........ नाक पर रूमाल रख कर और सांस बंद कर के वो ग़लाज़तों की इस कोठड़ी में दाख़िल हुआ........ फ़र्श पर कीड़े चल रहे थे। दीवारों पर इंसान के शर्म-नाक हिस्सों की नक़्क़ाशी करने के लिए अब कोई जगह बाक़ी नहीं रही थी........ “मुस्लमानों की बहन का पाकिस्तान मारा” और “हिंदूओं की माँ का अखंड हिंदूस्तान मारा” के अल्फ़ाज़ मद्धम पड़ गए थे। मगर उन के नीचे सफ़ैद चाक से लिखे हुए ये अल्फ़ाज़ उभर रहे थे।
“दोनों की माँ का हिंदूस्तान मारा”
इन अल्फ़ाज़ ने एक लहज़े के लिए मूत्री की बद-बू ग़ायब कर दी........ वो जब आहिस्ता आहिस्ता बाहर निकला तो उसे यूं लगा कि उसे बद-बूओं के इस घर में एक बे-नाम सी महक आई थी। सिर्फ़ एक लहज़े के लिए।
(सन्न-ए-तस्नीफ़ 1945-ई-)
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सआदत हसन मंटो ( 11 मई 1912 - 18 जनवरी 1955 )

आगर भारत विभाजन का त्रासद और बीभत्स विवेकहीन हिंसक आयाम देखना है तो आप इस कहानीकार की कहानियां पढ़ें । जैसा घट रहा था, जैसा दिख रहा था , जैसा मन्टो के संवेदनशील मन ने महसूस किया वैसा ही पन्नों पर उतार दिया । कभी कभी अश्लील भी लग सकता है । पर साहित्य में अश्लीलता का आरोप कभी कभी यथार्थ से भागने का एक बहाना भी होता हैं। मैंने सबसे पहले उनकी कहानी पढी टोबा टेक सिंह और फिर तो मुझ पर  उनकी हर कहानी पढ़ने की दीवानगी छा गयी । उनकी सभी कहानियों का संग्रह जो दो भागों में मंटों की कहानियां शीर्षक से छपा है पढ़ डाला । कहानियां सिर्फ भारत विभाजन पर ही नहीं है , उन सारी परिस्थितियों पर भी है जो लेखक ने भोगा है । मन्टो का जन्म लुधियाना में आज ही के दिन हुआ था । विभाजन के पहले ही उनका परिवार लाहौर चला गया था या बंटवारे के बाद गया यह तो मैं नहीं बता पाउँगा पर वे बंटवारे  के बाद पाकिस्तान में ही थे और वहीँ उनका निधन हुआ । मंटो 1912 में जन्मे और 18 जनवरी 1955 में 42 साल की उम्र में दिवंगत हो गए । कभी कभी मुझे लगता है प्रतिभा और आयु में भी हल्का फुल्का बैर है । कुछ प्रतिभाएं अकाल ही यहां से रुखसत हो जाती हैं । मंटो को भी मैं उसी श्रेणी में रखता हूँ ।

मुम्बई या तब की बम्बई या अंग्रेजों की बॉमबे मंटो की कर्मभूमि रही है । बम्बई फ़िल्मी 1913 में दादा साहब फाल्के के राजा हरिश्चंद्र फ़िल्म जिसे भारतीय सिनेमा की पहली फ़िल्म माना जाता है के परदे पर आने के बाद देश की फ़िल्म कला का केंद्र बन चुकी थी । हिंदी उर्दू के अनेक नामचीन हस्ताक्षर वहाँ अपनी प्रतिभा प्रदर्शन के लिए जा रहे थे । हिंदी के महानतम कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द , प्रसिद्ध उपन्यास कार अमृतलाल नागर, उर्दू के कृष्ण चन्दर, ख्वाज़ा अहमद अब्बास ,और मंटो भी उसी परम्परा में मुम्बई पहुंचे । साहित्य का वह प्रगतिवादी काल था । उर्दू में इसे तरक़्क़ीपसंद कहते हैं । ऐसे लेखकों के संगठन भी अस्तित्व में आ गए थे और खूब सक्रिय भी थे । मंटो भी इनसे जुड़े । पर मुझे लगता है किसी खेमे में बंध कर जीने वाले जीव वह नहीं थे । उनका लेखन जस देखा तस छापा की तरह रहा । उनकी प्रारंभिक रचनाएं निश्चित रूप से समाजवादी सोच और विचारों से प्रभावित थी पर बाद की रचनाएं समाज के उस अन्धकार के अंदर घुसती प्रतीत होती हैं, जहाँ हम अमुमन झांकना नहीं चाहते हैं । उन्होंने समाज की विकृतियों को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ देखा और उसे अपनी रचनाओं में उतारा । एक नज़र में कुछ रचनाएं जुगुप्सा जगाएंगी पर हम अक्सर समाज की उन जुगुप्सा जगाने वाली बातों से नज़र भी चुरा लेते हैं । पर यथार्थ तो यथार्थ है । आदर्श कभी कभी एक नकली खोल डाले भी रहता है । मंटो ने उसी खोल को उधेड़ कर कहीं न कहीं अपनी रचनाओं में दिखा दिया है ।

उनकी पहली कहानी तमाशा है । यह कहानी आधारित है जलियावाला बाग़ के निर्मम नरसंहार पर । फिर तो लेखनी रुकी नहीं और निरन्तर कुछ न कुछ लिखती रही । उन्होंने कहानियों के अतिरिक्त नाटक, फिल्मों के लिये पटकथाएं , निबंध, व्यंग्य और पत्र भी लिखे । उनके अपने समकालीनों से हुआ पत्र व्यवहार भी कम रोचक साहित्य नहीं है । उनके संस्मरण भी उपलब्ध है वह तप फ़िल्मी दुनिया की संगदिली के अनेक किस्से समेटे हैं । उनकी प्रमुख कहानियां है , टोबा टेक सिंह , ठंडा गोश्त, बू , खोल दो, काली शलवार, आदि आदि । इन सब को मैंने हिंदी में पढ़ा है । लेकिन उर्दू से हिंदी में अनुवाद की कोई ज़रूरत ही नहीं है । बस उसे देवनागरी लिपि में ही लिख देना है ।

मैं कोई साहित्य का आलोचक नहीं हूँ । एक पाठक हूँ । जिसे अच्छा और जो रुचिकर लगे उसे पढता हूँ । मेरी मित्र सूची में हिंदी के कई प्रतष्ठित पत्रकार, लेखक गण और आलोचक भी है। उनसे अनुरोध है कि यह केवल एक पाठकीय प्रतिक्रिया है । आलोचना के विभिन्न मापदंडो के अनुसार किसी लेखक के साहित्य की पड़ताल यह नहीं है और न ही वैसी मेरी प्रतिभा है । सआदत हसन मंटो को उनकी पुण्यतिथि पर उनका विनम्र स्मरण ।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 14 January 2018

कुंभमेला में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के भूमि आवंटन पर विवाद / विजय शंकर सिंह

सनातन धर्म की परंपरा में शंकराचार्य का स्थान सर्वोच्च है। आदि शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना की थी। यह चार पीठ है, बद्री केदार ज्योतिषपीठ, द्वारिका पीठ, पुरी पीठ और श्रृंगेरी पीठ। शंकराचार्य सनातन धर्म के सन्यासी परम्परा के प्रमुख होते हैं। महंत, श्री महंत, मंडलेश्वर, महा मंडलेश्वर, आचार्य महा मंडलेश्वर और शंकराचार्य। भारत वर्ष की भौगोलिक सीमा जिसमें आज का पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल है , को इनके आधीन क्षेत्रों में बांटा गया है । मूलतः यह शैव परम्परा है पर सनातन धर्म मे यही स्थापित और मान्य सन्यासी परम्परा भी है। इन चार पीठों के अतिरिक्त एक अन्य पीठ बाद में गठित हुयी जो काशी में है जिसे सुमेरु पीठ कहते हैं। लेकिन असल मान्यता मूल रूप से स्थापित चार पीठों की ही है। इनका अपना कोड ऑफ कंडक्ट , आचरण नियमावली है। यह एक छोटी सी पुस्तक मठामनाय महानुशासन में उल्लिखित है। लेकिन अधिकांश परम्पराएं हैं जो समय समय पर स्थापित और परिवर्तित होती रही है। शंकराचार्य को ब्रिटिश काल से ही वीआईपी दर्जा दिया गया है। इनका प्रोटोकॉल भी है।

ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य हैं स्वामी स्वरूपानंद । ज्योतिष एवं द्वारका, दो पीठों के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी का जन्म 2 सितम्बर 1924 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में दिघोरी गांव में हुआ था। 8 आठ वर्ष की अवस्था में उन्होंने घर छोड़ कर धर्म यात्रायें प्रारम्भ कर दी थीं। इस दौरान वह काशी पहुंचे और यहां उन्होंने  स्वामी हरिहरानंद सरस्वती जी ( स्वामी करपात्री जी महाराज ) से वेद-वेदांग, न्याय, उपनिषदों,शास्त्रो की शिक्षा प्राप्त की। वे क्रांतिकारी साधु  के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसी दौरान उन्होंने वाराणसी की जेल में 9 और मध्यप्रदेश की जेल में 6 महीने की सजा भी काटी। वे राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे। 1950 में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी बह्मानन्द सरस्वती जी महाराज द्वारा  दंडी संन्यासी की दीक्षा दी  गई और  स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे। 7 दिसम्बर 1973 को  ज्योतिष पीठ एवं 24 अप्रेल 1984 में द्वारका शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य की उपाधि मिली।  उन्होंने झोतेश्वर में राज राजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का भव्य मंदिर बनवाया। यह मंदिर देश भर में अनूठा है। वर्तमान में वे भारत के सबसे वरिष्ठ संन्यासी हैं उनकी उम्र 94 वर्ष  है। इस उम्र में भी वे धर्म प्रचार यात्रा करते रहते हैं। उनके शिष्यों की संख्या लाखों में है। सबसे वरिष्ठ शंकराचार्य है और पट्टाभिषेक होने के बाद ,अदालती विवाद भी हुआ था। उनके नियुक्ति को चुनौती दी गई। मामला अदालत में रहा और अब फिर यह हल हो गया और पुनः उनका पट्टाभिषेक हुआ ।

आज के अखबार हिंदुस्तान में यह छपा है कि इनके प्रवास के लिये कुम्भ मेला में स्थान आवंटित नहीं किया जा रहा है। इनका कहना है कि विश्व हिंदू परिषद ने स्थान न मिले इस हेतु सरकार पर दबाव डाला है। ये वीएचपी के हिंदुत्व की अवधारणा के विपरीत राय रखते हैं। इनका कहना है कि जो सच्चे सनातन धर्म की बात करता है उसे वीएचपी हतोत्साहित करता है। राम मंदिर मामले पर भी शंकराचार्य की राय वीएचपी से अलग है। इसी लिये अयोध्या के परम्परावादी सन्त समाज और वीएचपी में यदा कदा टकराव होता रहता है। यह टकराव कुछ कुछ राजनैतिक भी है।  स्वामी स्वरूपानंद के अनुसार उन्होंने ज़मीन के लिये प्रार्थना पत्र दिया तो उस पर मेलाधिकारी द्वारा पहले विधिक राय मांगी गई फिर जब विधिक राय पक्ष में आ गई तो सरकार के दबाव में ज़मीन नहीं दी गयी।

कुंभ मेले का उद्देश्य यही है कि 12 साल बार सनातन धर्म के विभिन्न शाखा प्रशाखा के लोग और सन्त विचारक एकत्र हों और धर्म का शोधन हो। काल सदैव बदलता रहता है। स्थान, सोच और परिस्थितियां भी। यह धर्म ही नेति नेति का है। नेति का अर्थ अभी अंत नहीं हुआ है। क्योंकि कि जो है वह अनादि है और अनन्त भी। लेकिन चारों शंकराचार्य को एक साथ एक स्थान पर एकत्र होने पर भी रोक है। कारण सम्भवतः सुरक्षा रही होगी। ताकि किसी आसन्न स्थिति में कम से कम एक बचे रहें जिस से धर्म का नेतृत्व किया जा सका। नागा साधु और शंकराचार्य की परम्परा में ही अखाड़े भी आते हैं। अखाड़ों के बिना कुम्भ की कल्पना ही नहीं की जा सकती है।

स्वामी स्वरूपानंद और विश्व हिंदू परिषद में पहले भी मत वैभिन्यता रही है। यह पहले भी विवादों में आ चुके हैं। साई पूजन और साईं बाबा की मूर्ति को भी हिन्दू धर्म के मंदिरों में स्थापित करने को शास्त्रों के विपरीत बताया था। यह मतभेद आज भी बना हुआ है। सनातन परंपरा में मत वैभिन्यता एक सामान्य बात है। इस से शास्त्रार्थ और बहस और फिर नयी मान्यताओं के स्थापित होने का अवसर मिलता है। शंकराचार्य के तमाम विरोध के बावजूद भी सनातन धर्म की सन्यासी परम्परा में उस पद और उस पद पर पट्टाभिषिक्त सन्यासी का जो महत्व है वह सर्वोपरि है। शेष तो राजनीति है।

© विजय शंकर सिंह