Wednesday, 25 April 2018

Ghalib - Unhe sawaal pe jo'ame junuun hai kyun ladiye / उन्हें सवाल पे जोअमे जुनूँ है क्यूं लड़िये - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 66.
उन्हें सवाल पे जोअमे जुनूँ है, क्यूं लड़िये,
हमें जवाब से कतअये नज़र है क्या कहिये !!

Unhe sawaal pe jo'ame junoon hai kyun ladiye,
Hamen jawaab se qat'aye nazar hai kyaa kahiye !!
- Ghalib

जोअमे जुनूँ   -  दर्प से भरा हुआ.
क़ता ए नज़र - नज़रअंदाज़ करना.

उनके सवाल उन्माद और घमंड से भरे हुये है। वे जब भी सवाल करते हैं तो उसमें उनका अहंकार दिखता है। ऐसे लोगों के ऐसे अहंकारी सवालों का उत्तर हम क्या दें ? वे ऐसे ही दर्पयुक्त सवाल पूछने के आदी हैं और हम ऐसे सवालों को नज़रअंदाज़ करने के । इन सवालों पर क्या लड़ना औऱ क्यों लड़ना । अब यह तो अपनी अपनी आदत है। इस पर क्या कहिये !

प्रश्नों के भी उद्देश्य होते है। कुछ प्रश्न जिज्ञासु भाव, तो कुछ प्रश्न अहंकार की अभिव्यक्ति होते हैं।  अहंकार से भरे प्रश्न का उद्देश्य ही अपना दर्प महत्व और घमंड दिखाना होता है। गालिब का यह शेर, इसी प्रसंग में हैं ।

उनकी बातें, उनका लहजा, उनके सवाल ये सब घमंड से भरे पड़े हैं। यह अहंकार की अभिव्यक्ति है। यह सवाल नहीं दर्पोक्ति है। जब सवाल पूछने में ही जिज्ञासा और उत्सुकता के बजाय अहंकार दिखने लगे तो ऐसे लोगों के सवालों का क्या उत्तर दिया जाय । उचित यही है कि ऐसे घमंडी सवालों को नजरअंदाज कर दिया जाय। ग़ालिब का यह नसीहत भरा शेर, आज भी मौजूं है।

© विजय शंकर सिंह

Tuesday, 24 April 2018

Ghalib - Unhe manzoor apne zakhmiyon kaa dekh aanaa thaa / उन्हें मंज़ूर अपने जख्मियों का देख आना था - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 65.
उन्हें मंज़ूर अपने जख्मियों का देख आना था,
उठे थे सैर ए गुल को, देखना शोखी बहाने की !!

Unhe manzoor apne zakhmiyon kaa dekh aanaa thaa,
Uthe the sair e gul ko, dekhnaa shokhii bahaane kee.
- Ghalib

उठे तो वो अपने से घायलों की दशा का जायज़ा लेने को , पर फुलवारी की सैर तो एक बहाना थी।

यह एक कठिन और बहुत जटिल अर्थ समेटे हुये शेर है। अंग्रेज़ी में एक शब्द है सैडिज़्म। परपीड़ा में ही आंनद प्राप्त करना। मनोविज्ञान इसे एक प्रकार की ग्रन्थि complex मानता है। इस शेर में उसी ग्रन्थि की ओर ग़ालिब का इशारा है। प्रेयसी को यहां परपीड़क रूप में देखा गया है। वह अपने प्रेमी यानी को पीड़ा में देख कर आंनदित होते हैं। वह जब उपवन में घूमते जाती है तो उसका उद्देश्य सैर करना नहीं बल्कि उपवन में उसके जो चाहने वाले हैं उसे तड़पाना और जिन्हें वह घायल कर चुकी है उसे देखना है। यह देखना भी सहानुभूति की नज़र से नहीं बल्कि उस पीड़ा से खुद को आंनदित करना है।  अपने प्रेमियों की इस तड़प से वह आंनदित होती है। प्रेयसी को प्रेमी की तड़प में ही आंनद मिल रहा है। यह प्रेम का उलाहना भाव भी है। उपालंभ है।

इस शेर को सैडिज़्म के उदाहरण के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा सकता है। सैडिज़्म, के पीछे ईर्ष्या, विद्वेष, आदि हिंसक मनोभाव प्रभावी होते हैं पर यहां प्रेम है, प्रेयसी को पाने की लालसा है, ललक है और उस ललक, कामना की जब उपेक्षा प्रेयसी द्वारा होती है तो वह परपीड़क नज़र आती है। सैडिज़्म का उपयोग मैंने दूसरे की पीड़ा में सुख ढूंढने के अर्थ में ज़रूर किया है, पर वह हिंसा भाव बिल्कुल नहीं है । यह प्रेम की एक नियति भी है। इसी से मिलती जुलती महादेवी वर्मा की यह पंक्तियाँ पढ़ें ,

पर शेष नहीं होगी, मेरे प्राणों की यह क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूंढा, तुममे ढूंढूंगी पीड़ा !!
( महादेवी वर्मा )

महादेवी ने भी प्रिय को पीड़ा में ढूंढने और फिर उस मिलन में भी पीड़ा ढूंढने की अजब बात कहती है। प्रेम पीड़ा देता है पर उस पीड़ा के इच्छुक भी कम नहीं है। प्रेम की पीड़ा का आनंद तो प्रेमी युगल ही जान सकते हैं।

© विजय शंकर सिंह

24 अप्रैल, दिनकर की पुण्यतिथि पर उनका विनम्र स्मरण / विजय शंकर सिंह

रामधारी सिंह दिनकर मूलतः एक कवि थे। 1964 से 72 तक जब मैं यूपी कॉलेज में था तो 1968 में दिनकर आये थे। उनकी कविता सुनी थी हमने। उनसे मिलने का न कोई अवसर मुझे मिला और न ही अवसर की इच्छा थी। बस उनको सुना। यह पता लगा कि वे एक बहुत बड़े कवि है। फिर जब रश्मिरथी पढ़ी तो दिमाग खुलने लगा। फिर जो जो पुस्तकें मिलती गयीं पढता गया। कुछ समझ मे आयीं कुछ ऊपर से निकल गयीं। लिखा भी तो इन्होंने कम नहीं है। पद्य और गद्य मिला कर इन्होंने कुल 63 रचनाएं लिखी है। कविता संग्रह, खण्ड काव्य, महाकाव्य इतिहास, समकालीन राजनीति, आज़ादी के आंदोलन, नेहरू, गांधी सभी पर तो कलम चली इनकी।

इतिहास और संस्क्रति पर इनकी बहुत ही प्रमाणिक और अच्छी पुस्तक है संस्कृति के चार अध्याय। यह पुस्तक भारतीय इतिहास और संस्क्रति की एक रूपरेखा है। कोई भी व्यक्ति अगर भारतीय सांस्कृतिक धारा का आद्योपांत अध्ययन एक ही पुस्तक में करना चाहता है तो उसे यह पुस्तक ज़रूर पढ़नी चाहिये। यह न तो शुष्क अकादमिक इतिहास की पुस्तक है और न ही गल्प के क्षेपकों से सजी धजी कोई हल्की फुल्की किताब। यह रोचक और ज्ञानवर्धक विवरण है। कवि दिनकर इस पुस्तक में बिल्कुल दूसरी भूमिका , इतिहास और संस्कृति के एक सजग और सतर्क अध्यापक की भूमिका में नज़र आते हैं।

दिनकर की एक कविता शायद मेरे इंटर के कोर्स में थी कि आखिरी कुछ पंक्तियां यहां स्मरण से लिख रहा हूँ। यह उनके किस संग्रह में है नहीं बता पाऊंगा। यह कविता है पाटलिपुत्र की गंगा। पटना यानी प्राचीन पाटलिपुत्र के वैभव को याद करते हुए दिनकर कहते हैं,

अस्तु आज गोधूलि लग्न में,
गंगे मंद मंद बहना,
गावों नगरों के समीप चल,
दर्द भरे स्वर में कहना।

करते हो तुम विपन्नता का,
जिसका अब इतना उपहास,
वहीं कभी मैंने देखा है,
मौर्य वंश का विभव विलास।

उनकी कुछ रचनाओं के कुछ अंश भी देखें। यह स्मरण से नहीं हैं बल्कि उद्धरित हैं।

किस भांति उठूँ इतना ऊपर ? 

मस्तक कैसे छू पाँऊं मैं . 

ग्रीवा तक हाथ न जा सकते, 
उँगलियाँ न छू सकती ललाट . 
वामन की पूजा किस प्रकार, 
पहुँचे तुम तक मानव,विराट .
O
रे रोक युधिष्ठर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर
पर फिरा हमें गांडीव गदा,
लौटा दे अर्जुन भीम वीर 
(हिमालय से)
O
क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास गरल हो;
उसको क्या जो दन्तहीन,
विषहीन, विनीत, सरल हो। 
( कुरुक्षेत्र से)
O
पत्थर सी हों मांसपेशियाँ,
लौहदंड भुजबल अभय;
नस-नस में हो लहर आग की,
तभी जवानी पाती जय। -
( रश्मिरथी से )
O
हटो व्योम के मेघ पंथ से, 
स्वर्ग लूटने हम जाते हैं;
दूध-दूध ओ वत्स तुम्हारा,
दूध खोजने हम जाते है।
सच पूछो तो सर में ही, 
बसती है दीप्ति विनय की;
सन्धि वचन संपूज्य उसी का, 
जिसमें शक्ति विजय की।
सहनशीलता, क्षमा, दया को 
तभी पूजता जग है;
बल का दर्प चमकता उसके 
पीछे जब जगमग है।"
दो न्याय अगर तो आधा दो, 
पर इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, 
रक्खो अपनी धरती तमाम।-
( रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 3)
O
जब नाश मनुज पर छाता है, 
पहले विवेक मर जाता है। 
(रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 3)।।

दिनकर राष्ट्रवादी कवि से। उनका राष्ट्रवाद राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा था। वे आज़ादी के संघर्ष में भी शामिल रहे हैं। वे आज़ादी के प्रबल पक्षधर थे। मूलतःवीर रस और स्वतंत्र चेतना के वाहक दिनकर के हर काव्य में सुप्त राष्ट्रवाद के दर्शन होते हैं। उनका राष्ट्रवाद, किसी धर्म को ही राष्ट्र मानने के भ्रम से दूर था। जितनी पकड़ उनकी वीर रस के काव्य पर थी उससे कम पकड़ उनकी शृंगार रस के साहित्य पर नहीं थी।

दिनकरजी को उनकी रचना कुरुक्षेत्र के लिये काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार से सम्मान मिला। संस्कृति के चार अध्याय के लिये उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। गुरू महाविद्यालय ने उन्हें विद्या वाचस्पति के लिये चुना। 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूड़ामणि से सम्मानित किया। वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिये उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गये और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे। भारत सरकार ने मरणोपरांत उन पर डाक टिकट भी जारी किया था।
इस महान साहित्यिक विभूति को नमन और उनका विनम्र स्मरण।

© विजय शंकर सिंह

Monday, 23 April 2018

Ghalib - Unke dekhe se jo aa jaatee hai munh par raunaq / उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 64.
उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है !!

Unke dekhe se jo aa jaatee hai, munh par raunaq,
Wo samjhte hain ki biimaar kaa haal achhaa hai !!
- Ghalib.

उनके देखते ही मुंह पर जो चमक आ जाती है, तो वे समझते हैं कि मुझ बीमार की तबीयत ठीक है।

प्रिय का दर्शन सुखद होता है। दुःख , अवसाद, रुग्णता किसी भी विपरीत परिस्थितियों में कोई हो और अचानक ऐसी दशा में उसके सामने कोई प्रिय आ जाय तो दुःख तो नहीं कम होता है पर दुःख की अनुभूति कम हो जाती है। जो सुख की लहर चेहरे पर तैरने लगती है। यह अनुभूति जो प्रिय के दर्शन से चेहरे पर आयी है उससे आगन्तुक यह सोचने लगता है कि ये तो प्रसन्न हैं और सुखी हैं। जब कि वास्तविकता ऐसी नहीं है। प्रिय के आने से वह प्रसन्न दिख रहा है न कि उसका दुःख कम हुआ है। हां दुःख की अनुभूति कम हो गयी है।

कभी कभी बेहद दुख में भी  प्रिय का संयोग आंसू ला देता है। पर वे अश्क़ दुख नहीं सुख के होते हैं। दुःख से कातर व्यक्ति को प्रिय दर्शन इस लिये सुखकर लगता है कि उसे लगता है उसके दुःख अब कम हो जायेंगे। प्रिय या तो दुःख बांट लेगा या दुःखों का निदान, समाधान ढूंढ लेगा। ग़ालिब ने इस शेर में इसी मनोदशा को बड़ी खूबसूरती से व्यक्त किया है।

© विजय शंकर सिंह

Sunday, 22 April 2018

Ghalib - Utnaa hee mujhko apnii haqeeqat se / उतना ही मुझको अपनी हक़ीक़त से - ग़ालिब / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 63
उतना ही मुझको अपनी हक़ीक़त से बोअद है,
जितना कि बहम ए गैर में हूँ, पेच ओ ताब में !!

Utnaa hii mujhko apanii haqeeqat se bo'ad hai,
Jitnaa ki baham e gair mein hun, pech o taab mein !!
- Ghalib.

अपनी हक़ीक़त, वास्तविकता, पहचान, से मैं उतना ही दूर हूँ, जितना कि ईश्वर से अपने आप को, अलग समझ कर दूर हूँ ।

भारतीय दर्शन का एक बोध वाक्य है, आत्म दीपो भव। पालि में यह अप्प दीपो भव है। इसका अंग्रेज़ी तरजुमा है know thyself. खुद को जानो। यह शेर इसी संक्षिप्त पर गूढ़ अर्थ समेटे वाक्य को ही ज़रा सा व्याख्यायित करता है। मुझे कुछ पता नहीं कि मैं क्या हूँ, कौन हूँ, मेरी हक़ीक़त क्या है। मैं इस वास्तविकता से उतना ही दूर हूँ, जितना कि मुझसे ईश्वर दूर है। अहम ब्रह्मास्मि, मैं ही ब्रह्म हूँ । या अनल हक़, मैं ही खुदा हूँ या सत्य हूँ यह सारे लघु वाक्य एक ही बात कहतें हैं बस इनकी ज़ुबान अलग अलग हैं। ग़ालिब इसी को कहते हैं कि उन्होंने अभी खुद को जाना नहीं है। वे अपनी वास्तविकता से अभी अपरिचित हैं। जिस दिन वे या कोई भी खुद को जान लेगा, पहचान लेगा, वह ईश्वर को जान लेगा। खुद को जान लेना ही सत्य से साक्षात्कार है।

यह भाव लगभग सभी सूफी और रहस्यवादी कवियों में मिलता है। सूफीवाद भी रहस्यवाद है। रहस्य है ईश्वर जो अजन्मा, अमर, अबूझा और अगम्य है। उसे जानने का क्रम चिरन्तन है और क्या पता कब तक रहे। कबीर भी एक रहस्यवादी और निर्गुण परंपरा के कवि थे।  इसी से मिलता जुलता कबीर का यह दोहा, पढ़ें।

' कबीर : सोच बिचारिया, दूजा कोई नाहिं,
आपा पर जब चीन्हिया, तब उलटि समाना माहिं !!

मैंने सोच विचार के बाद यह बात जान ली, कि ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। जब मैं अपने और पराये के भेद को जान गया तो, तब मैं पलट कर अपने मे समा गया। खुद में ही विलीन हो गया।

कबीर के साखी शबद रमैनी जो उनकी रचनाओं के संग्रह हैं में यह भाव सर्वत्र बिखरा पड़ा है। इसी से मिलता जुलता कबीर के दो और दोहे देखें,

झुठनि झूठ साच करि जाना,
झुठनि में सब साच लुकाना !!
( कबीर )

हम मिथ्या जगत के लोग, इसी जगत को सत्य और वास्तविक मान बैठते हैं। ईश्वर ने इसी मिथ्या में सत्य को छुपा रखा है ।
( कबीर )

अपने एक और इसी प्रकार के दोहे मे वे कहते हैं।

जग जीवन ऐसा सपने जैसा, जीवन सुपन समान,
सांचु करि हम गांठ दीनी, छोड़ि परम निधान !!
( कबीर )

यह जगत एक स्वप्न की तरह है, और यह जीवन भी स्वप्न है। हमने इसी मिथ्या भाव को ही सच मान लिया है। ईश्वर जो परम् सत्य है उसे हमने इसी मिथ्या भाव के कारण भुला रखा है।

यहां ग़ालिब और कबीर का यह कोई तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया गया है। क्यों कि मैं न तो ग़ालिब के अदब का जानकार हूँ और न हीं कबीर के साहित्य का मर्मज्ञ । मुझे ग़ालिब के शेर में जो दर्शन दिखा वही उनसे कई सदी पहले कबीर के दोहों में भी दिखा तो मैंने उसे यहां जोड़ दिया। ग़ालिब का यह शेर उनकी आध्यात्मिक पैठ और दृष्टि को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त करता है।  यही उनकी निराली अंदाज़ ए बयानी है।

© विजय शंकर सिंह

22 अप्रैल - लेनिन के जन्मदिन पर कैफ़ी आज़मी की एक नज़्म / विजय शंकर सिंह

व्लादिमीर इलीइच उल्यानोव, जिन्हें लेनिन के नाम से भी जाना जाता है, ( 22 अप्रैल 1870 – 21 जनवरी 1924 ) एक रूसी साम्यवादी क्रान्तिकारी, राजनीतिज्ञ तथा राजनीतिक सिद्धांतकार थे। लेनिन को रूस में बोल्शेविक क्रांति के नेता और ज़ारशाही के सामन्ती राज से मुक्तिदाता के रूप में दुनिया मे व्यापक पहचान मिली। वह 1917 से 1924 तक सोवियत यूनियन के कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख रहे।

1917 की रूसी क्रांति इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। मार्क्स के क्रांतिकारी सिद्धांतो पर आधारित इस महान क्रांति ने विश्व के शोषित और वंचित वर्गों के बीच एक चेतना जागृत कर दी और साम्राज्यवाद के उस दौर में गुलाम मुल्क़ों के लिये यह क्रांति एक प्रकाश स्तम्भ के रूप में स्थापित हुयी। ऐसा नहीं है कि मार्क्स और लेनिन ने केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से ही समाज को प्रभावित किया बल्कि साहित्य, सिनेमा, कला, दर्शन, जीवन शैली आदि सभी क्षेत्रों में अपना प्रत्यक्ष और तार्किक  प्रभाव डाला। भारतीय साहित्य भी इससे प्रभावित हुये बिना नहीं रह सका। हिंदी, उर्दू, बांग्ला, तमिल, मराठी आदि सभी साहित्यों में प्रगतिवादी रचनायें लिखी गयी। लेखकों की एक पीढ़ी ही प्रगतिशील या तरक़्क़ीपसन्द विचारों से पोषित और पल्लवित हुई। उर्दू के ख्यातनाम शायर कैफ़ी आज़मी भी एक तरक़्क़ीपसन्द ओर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित शायर थे। यह नज़्म उन्होंने लेनिन की स्मृति में लिखी है।
अब आप यह नज़्म पढ़ें।
O

आसमां और भी ऊपर को उठा जाता है,
तुमने सौ साल में इंसां को किया कितना बलंद,
पुश्त पर बाँध दिया था जिन्हें जल्लादों ने,
फेंकते हैं वही हाथ आज सितारों पे कमंद।

देखते हो कि नहीं
जगमगा उट्ठी है मेहनत के पसीने से जबीं,
अब कोई खेत खते-तक़दीर नहीं हो सकता
तुमको हर मुल्क की सरहद पे खड़े देखा है
अब कोई मुल्क हो तसख़ीर नहीं हो सकता।

ख़ैर हो बाज़ुए-क़ातिल की, मगर खैर नहीं
आज मक़तल में बहुत भीड़ नज़र आती है
कर दिया था कभी हल्का-सा इशारा जिस सिम्त
सारी दुनिया उसी जानिब को मुड़ी जाती है।

हादिसा कितना बड़ा है कि सरे-मंज़िले-शौक़
क़ाफ़िला चंद गिरोहों में बंटा जाता है
एक पत्थर से तराशी थी जो तुमने दीवार
इक ख़तरनाक शिगाफ़ उसमे नज़र आता है।

देखते हो कि नहीं
देखते हो, तो कोई सुल्ह की तदबीर करो
हो सकें ज़ख्म रफू जिससे, वो तक़रीर करो
अह्द पेचीदा, मसाईल हैं सिवा पेचीदा
उनको सुलझाओ, सहीफ़ा कोई तहरीर करो।

रूहें आवारा हैं, दे दो उन्हें पैकर अपना
भर दो हर पार-ए-फौलाद में जौहर अपना
रहनुमा फिरते हैं या फिरती हैं बे-सर लाशें
रख दो हर अकड़ी हुई लाश पर तुम सर अपना ।
( कैफ़ी आज़मी )
O

कैफ़ी आज़मी (असली नाम, अख्तर हुसैन रिजवी) उर्दू के एक अज़ीम शायर थे। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिए भी कई प्रसिद्ध गीत व ग़ज़लें भी लिखीं, जिनमें देशभक्ति का अमर गीत -"कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों" भी शामिल है। कैफ़ी साहब मार्क्सवादी विचारों से बहुत प्रभावित थे। वे उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के रहने वाले थे। क़ैफ़ी आज़मी को राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा कई बार अपने खूबसूरत और दिलकश गीतों के लिये फिल्मों का सम्मानित फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला है ।1974 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था।

© विजय शंकर सिंह

Saturday, 21 April 2018

22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं और पृथ्वी सूक्त - एक चर्चा / विजय शंकर सिंह

दुनिया भर के देश 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के रूप में मनाते हैं। यह दिवस पर्यावरण जागरूकता को समर्पित एक वार्षिक आयोजन है ।  इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में  पर्यावरण से जुड़े एक शैक्षणिक कार्यक्रम से की थी। यह दिवस अब 192 से अधिक देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है। यह तारीख उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत और दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद के मौसम की होती है।

तीव्र औद्योगिक विकास ने यूरोप और अमेरिका के अनेक सघन औद्योगिक क्षेत्रों में पर्यावरण को बहुत ही हानि पहुंचाई। नदियां, जंगल और भूमिगत जल श्रोत भी विषैले होने लगे। इन सब की वैज्ञानिक रपटों ने देश मे पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता उतपन्न की। 9 सितम्बर 1969 में सिएटल, वाशिंगटन में एक सम्मलेन का आयोजन किया गया, जिसमें विस्कोंसिन के अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन घोषणा की कि 1970 की वसंत में पर्यावरण पर राष्ट्रव्यापी जन प्रदर्शन किया जायेगा। यह जन प्रदर्शन किसी के विरुद्ध नहीं बल्कि जनता को जागरूक करने के लिये किया जाएगा। सीनेटर नेल्सन ने पर्यावरण को एक राष्ट्रीय एजेंडा में जोड़ने के लिए पहले राष्ट्रव्यापी पर्यावरण विरोध की प्रस्तावना दी। उन्होंने यह लड़ाई सीनेट में भी शुरू की । उनका उस समय की औद्योगिक और पूंजीवादी लॉबी ने बहुत विरोध किया। क्यों कि यह जागरूकता और पर्यावरण बचाओ आंदोलन से पूंजीपतियों का हित टकरा रहा था। जेराल्ड नेल्सन कहते हैं कि,
  "यह एक जुआ था, लेकिन इसने काम किया। लोग जगे, जुटे और खड़े हो गये। बाद में सरकार ने भी जन स्वास्थ्य और भावी पीढ़ी के लिये इस ओर ध्यान दिया। "

इसी बीच पर्यावरण के प्रति सचेत और एक्टिविस्ट तथा जाने माने फिल्म और टेलिविज़न अभिनेता एड्डी अलबर्ट ने पृथ्वी दिवस, के मनाये जाने के बारे में जन जागृति उतपन्न करने और जन जागरण हेतु बहुत से प्राथमिक और महत्वपूर्ण कार्य किये, जिसका उन्हें व्यापक समर्थन मिला। अल्बर्ट के योगदान को चिर स्थायी बनाने के लिये 1970 के बाद, एक रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी दिवस को अलबर्ट के जन्मदिन, 22 अप्रैल, को मनाये जाने की परंपरा पड़ी। अलबर्ट को टीवी शो ग्रीन एकर्स में प्रभावी भूमिका के लिए भी जाना जाता था, जिसने तत्कालीन अमेरिकी समाज के सांस्कृतिक और पर्यावरण चेतना पर बहुमूल्य प्रभाव डाला था ।

भारतीय परंपरा में पर्यावरण की चिंता वेदों के काल से की गयी है। समस्त प्रकृति ही पूज्य थी। प्रकृति पूजा के अनेक प्रसंग वैदिक साहित्य में भरे पड़े है।  यजुर्वेद के एक लोकप्रिय मंत्र में समूचे पर्यावरण को शान्तिमय बनाने की अद्भुत स्तुति है। स्वस्तिवाचन की इस अद्भुत ऋचा में द्युलोक, अंतरिक्ष और पृथ्वी से शान्ति की भावप्रवण प्रार्थना है।

।। ॐ द्यौ शांतिरन्तरिक्ष: शांति: पृथ्वी शांतिराप: शान्ति: रोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिब्रह्म शान्ति: सर्वं: शान्ति: शान्र्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॐ।।
( यजुर्वेद- 36.17 )

"जल शान्ति दे, औषधियां-वनस्पतियां शान्ति दें, प्रकृति की शक्तियां - विश्वदेव, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शान्ति दे। सब तरफ शान्ति हो, शान्ति भी हमें शान्ति दें।"
यहां शान्ति भी एक देवता हैं।

प्रथम वेद ऋग्वेद में भी वायु, सरिता जल, और पृथ्वी के कण कण को मधुर होने की कामना की गयी है।

"मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव:। माध्वीर्न: सन्त्वोषधी:।। मधु नक्तमुतोष सो मधुमत्पार्थिवं रज:। मधु घौरस्तु न: पिता।। मधुमान्नो वस्पतिर्म धुमां अस्तु सूर्य:। माध्यवीर्गावो भवन्तु न:।।
( ऋग्वेद 1.90/6,7,8 )

वायु मधुमय है। नदियों का पानी मधुर हो, औषधियां, वनस्पतियां मधुर हों। माता पृथ्वी के रज कण मधुर हों, पिता आकाश मधुर हों, सूर्य रश्मियां भी मधुर हों, गाएं मधु दुग्ध दें।

भूमि पर तो अथर्ववेद में पूरा भूमि सूक्त ही है। यह भूमि, धरित्री, जो धारण करती है के महत्व को दर्शाता है। भूमि के प्रति पग पग पर कृतज्ञता व्यक्त की गयी है। पृथ्वी सूक्त में कहा गया है,

"देवता जिस भूमि की रक्षा उपासना करते हैं वह मातृभूमि हमें मधु सम्पन्न करे। इस पृथ्वी का हृदय परम आकाश के अमृत से सम्बंधित रहता है। वह भूमि हमारे राष्ट्र में तेज बल बढ़ाये। '

यामश्विनावमिमातां विष्णुयस्यां विचक्रमे। इन्द्रो यां चक्र आत्मनेऽनमित्रां शचीपतिः। सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः।।10।।

यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वः संवभूवुः। तासु नो धेह्यभि नः पवस्व माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः। पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु।।12।।

सूर्य और चन्द्र से इस पृथिवी का मानो मापन हो रहा है। मापन से यहां यह अभिप्राय है कि पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए सूर्य व चन्द्र मानो पृथिवी को माप ही रहे हैं। इन सूर्य-चन्द्र के द्वारा सर्वव्यापक प्रभु पृथिवी पर विविध वनस्पतियों को जन्म दे रहे हैं। यह पृथिवी शक्ति व प्रज्ञान के स्वामी जितेन्द्रिय पुरूष की मित्र है। यह भूमि हम पुत्रों के लिए आप्यायन के साधनभूत दुग्ध आदि पदार्थों को दे ।

पृथ्वी सूक्त के 12.1.7 व 8 श्लोक कहते हैं,
"हे पृथ्वी माता आपके हिम आच्छादित पर्वत और वन शत्रुरहित हों। आपके शरीर के पोषक तत्व हमें प्रतिष्ठा दें। यह पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके पुत्र- माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्या:। (वही 11-12) स्तुति है।

"हे माता! सूर्य किरणें हमारे लिए वाणी लायें। आप हमें मधु रस दें, आप दो पैरों, चार पैरों वाले सहित सभी प्राणियों का पोषण करती हैं।"

यहां पृथ्वी के सभी गुणों का वर्णन है लेकिन अपनी ओर से क्षमायाचना भी है,

"हे माता हम दायें- बाएं पैर से चलते, बैठे या खड़े होने की स्थिति में दुखी न हों। सोते हुए, दायें- बाएं करवट लेते हुए, आपकी ओर पांव पसारते हुए शयन करते हैं- आप दुखी न हों। हम औषधि, बीज बोने या निकालने के लिए आपको खोदें तो आपका परिवार, घासफूस, वनस्पति फिर से तीव्र गति से उगे-बढ़े। आपके मर्म को चोट न पहुंचे।"

63 मंत्रों में गठित इस पृथ्वी सूक्त को अमरीकी विद्वान ब्लूमफील्ड ने विश्व की श्रेष्ठ कविता बताया है।

पृथ्वी दिवस का भले ही 1970 से मनाया जाना प्रारम्भ हुआ हो, पर पृथ्वी, जल, जंगल, और जीव के प्रति भारतीय वांग्मय में सदैव उदात्त और जागरूक भाव रहा है। पर्यावरण के प्रति लोग सचेत रहें इसी लिये प्रकति में देवत्व की अवधारणा की गयी है।
पृथ्वी दिवस की अंनत शुभकामनाएं !!

( वैदिक ऋचाये और उनके अर्थ, महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज के एक लेख का अंश है । यह लेख मनीषी की लोकयात्रा में है। गोपीनाथ कविराज काशी के थे और प्राच्य वांग्मय पर उन्होंने बहुत काम किया है । )

© विजय शंकर सिंह