Sunday, 10 December 2017

पाकिस्तान की साज़िश और सरकार की चुप्पी बेहद गम्भीर बात है / विजय शंकर सिंह

यह भी पहली बार ही ज्ञात हुआ कि पाकिस्तान किसी अन्य या भारत जैसे बड़े देश के एक राज्य में सीएम बनवाने की हैसियत में आ गया है ।

बीबीसी के एक समाचार के अनुसार 10 दिसंबर को बनासकांठा के पालनपुर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने आरोप लगाया कि गुजरात के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सीमापार से मदद से ले रहे हैं ।

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, मोदी ने कहा कि पाकिस्तानी सेना के पूर्व डायरेक्टर जनरल सरदार अरशद रफ़ीक़ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते हैं ।

इसके साथ ही मोदी ने मणिशंकर अय्यर के 'नीच' शब्द वाले बयान पर एक बार फिर हमला किया और कहा, ''पाकिस्तान के उच्चायुक्त के साथ बैठक करने के बाद वे मुझे नीच बुलाते हैं.''

मोदी ने कहा, ''मीडिया में ऐसी ख़बरें थी कि मणिशंकर अय्यर के घर एक गुप्त बैठक की गई जिसमें पाकिस्तान के उच्चायुक्त समेत, पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री, भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शामिल हुए.''

एक तरफ 150 सीट जीतने की आशा, दूसरी तरफ #पाकिस्तान का #अहमद_पटेल को #सीएम बनाने की कोशिश का आरोप। यह हताशा है, घबराहट है या रहस्योद्घाटन है ? क्या है यह ? अहमद पटेल सीएम हों या न हों, लेकिन यह आरोप गम्भीर है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

जिस पाकिस्तान को 1965 में लाल बहादुर शास्त्री जी की नेत्रित्व क्षमता ने कम साधन होने पर भी खदेड़ दिया था और हम लाहौर तक पहुंच गए,
जिस पाकिस्तान के दो टुकड़े इंदिरा गांधी ने अमेरिकी सरपरस्ती के बाद कर के अलग कर दिये,
जिस पाकिस्तान के करगिल में अटल सरकार के समय दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में बिना एलओसी को पार किये भारतीय सेना ने छक्के छुड़ा दिए,
इसी सरकार के समय सेना ने कुशलता पूर्वक पाक सीमा में घुस कर सर्जिकल हमला कर आतंकियों के ठिकाने ध्वस्त किये ,
जिस पाकिस्तान को पिछले 70 साल से कश्मीर में सेना सफल नहीं हो दे रही है,
वही पाकिस्तान आज इस हैसियत में आ गया है कि वह हमारे एक प्रांत का मुख्य मंत्री तय कर रहा है !
यह तो कमाल की बात है।

इस से भी कमाल की बात यह है कि पाकिस्तान के इस षडयंत्र का राज पीएम सर को खुद ज्ञात है । यह भी पता है कि षडयंत्र में कौन कौन शामिल है ।
फिर भी अगर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो रही है तो उसका दोष किस पर है ?

और अगर आज पाकिस्तान की यह हिम्मत पड़ रही है तो इसका कारण कहीं यह तो नहीं कि,
पीएम बिना बुलाये, बिना किसी औपचारिक मुलाक़ात के नवाज़ शरीफ़ के घर तशरीफ़ ले गये ।
आईएसआई जो समस्त पाक आतंकियों की जननी है को बुला कर पठानकोट एयरबेस का मुआयना कराया ।

मणिशंकर अय्यर जा कर पाकिस्तान में मोदी जी की सुपारी दे आते हैं और निर्द्वन्द्व देश मे विचरण करते रहते हैं और सारी सरकारी जांच एजेंसियां चुप है और हाँथ पर हाँथ धरे बैठी रहती हैं और पीएम बेचारे की तरह अपनी व्यथा हम सब से कहते हैं ! यह उनकी शालीनता है या अकर्मण्यता यह तो वे ही जानें पर इतने गम्भीर आरोपों पर चुप्पी तो प्रशासनिक अक्षमता ही है। अहमद पटेल,मणि शंकर अय्यर और डॉ मनमोहन सिंह को पाकिस्तानी अफसर के साथ साज़िश रचने के आरोप में सरकार को उनके खिलाफ तत्काल कार्यवाही करनी चाहिये।

एक क्षण के लिये अगर इसे सच मान भी लें तो यह एक गम्भीर अंतरराष्ट्रीय साज़िश का माया जाल हो सकता है, और इसके तार अमेरिका से जुड़ेंगे या फिर चीन से । अमेरिका का सीआईए दशकों से तीसरी दुनिया के देशों को अस्थिर करने में कभी लगा रहता था, पर अब वह थोड़ा शिथिल पड़ गया है। चीन अब इस खेल का नया खिलाड़ी हो सकता है ।

© विजय शंकर सिंह 

Saturday, 9 December 2017

प्रधानमंत्री जी के नाम एक खुला पत्र / विजय शंकर सिंह

यह एक खुला पत्र है। इसके लेखक है जयंत जिज्ञासु । लेखक से मैं परिचित नहीं हूं पर लेख मुझे अच्छा लगा और उस से सहमत भी हूँ तो उसे साझा कर रहा हूँ। यह पत्र देश मे बढ़ रहे सामाजिक दुर्भाव से जुड़ा है, धर्मान्धता से प्रेरित होकर होने वाली हिंसा और हत्या से जुड़ा है। राजसमंद की घटना निश्चित ही एक बर्बर और घृणित घटना है। उस से भी गर्हित वह इस लिये है कि वह हिन्दू धर्म और इसकी महान सभ्यता और संस्कृति के नाम पर की गयी हैं। पर पीएम का मौन अचंभित तो नहीं करता है पर उनके प्रति एक तरस भाव उत्पन्न करता है । आप यह पत्र पढ़े। 

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प्रिय प्रधानमंत्री जी, 
आप थोड़ा अपनी वाणी पर संयम रखें। आप 19 जीत जायें या मुमकिन है कि 24 भी, पर जो नुक़सान इस देश का हो रहा है, उसे आने वाले प्रधानमंत्री भी भर नहीं पायेंगे। राजस्थान में जो आज घटना हुई है, वो किसी इंसान की हत्या मात्र नहीं है, बल्कि सामाजिक सद्भाव की हत्या है। इस देश के आज़ाद 70 सालों की छोटी-मोटी उपलब्धियों की हत्या की क्रूर शुरुआत है।

रहम कीजिए इस देश पर, बख़्श दीजिए इस समाज को। आप चले जाएंगे आग लगाकर, पर बुझाने वाले पानी कहां से लाएंगे? इंसानियत के कुएं में कूड़ा डलवाकर आपने ढंकवा दिया है। अफ़सोस कि आज आपको डांटने के लिए संसद में कोई चंद्रशेखर, कोई भूपेश गुप्त, कोई मधु लिमये नहीं है, जिनकी डपट आपके गुरुदेव द्वय भी सर झुका कर सुन लेते थे, और आंशिक ही सही, अमल में लाने का भरोसा तो दिलाते थे।

आपने तो संसद को ही निलंबित अवस्था में डाल दिया है जिसके साथ जनहित के मुद्दे हवा में लटके हुए हैं। अपने ‘मन की बात’ को आपने संसदसत्र का पर्याय या स्थानापन्न बना दिया है। यह ठीक नहीं कर रहे आप, प्रधानमंत्री जी। एक तरफ आप मौनव्रत साधे रहते हैं, दूसरी तरफ ‘मनोरोगी’ हत्यारे ‘राजकीय संरक्षण’ के बल पर तांडव करते रहते हैं।

हिंदुस्तान की सारी गायों को आप अपने प्रधानमंत्री आवास में रख लें या गुजरात में अपने मित्र उद्योगपतियों को दे दें, प्रबंधन में माहिर अपने अध्यक्ष से कहें कि अडानी या अंबानी के घर बांध आएं, कुछ तो व्यवस्था करें। नहीं चाहिए हमें गाय-माल। इन गायों ने हमारे जानमाल की बहुत क्षति कर दी है। निरीह, निरपराध लोगों का जीना हराम कर रखा है।

अलौली के मेरे गांव स्थित घर में चार गायें हैं, आप बिहार भाजपा के अपने अध्यक्ष नित्यानंद राय से कहें कि वो हमारे खूंटे से खोलकर ले जाएं। कुपोषण का शिकार हमारा परिवार बिना दूध के भी स्वस्थ रह लेगा, पर अपने अक्लियत भाइयों-बहनों का ख़ून होते नहीं देख सकते।

दस-दस गाय सरदाना-चौधरी-अंजना-रुबिया-चौरसिया-रजत-गोस्वामी-चौरसिया, आदि के यहाँ बंधवा दीजिए। यही लोग गोभक्त भी हैं और देशभक्त भी, मुल्क की समझ बस इन्हीं लोगों के पास है। वो जो गांव में इन चिल्लाने वाले एंकरों के एजेंडे से बेख़बर अमन-चैन से रहना चाहते हैं; वो सब ‘जाहिल’ हैं और आपके ‘नेशन फ़र्स्ट’ के प्रोजेक्ट में बाधक हैं। मिटाना चाहें, तो मिटा दें इन्हें अपनी इमेजिनेशन से, पर इतनी बेरहमी से घुटा-घुटा कर इन्हें जीते जी क्यों मार रही है आपका कट्टर समर्थक होने का दावा करने वालों की टोली।

क्या आप इतना सब देखने के बाद भी चैन की नींद सो लेते हैं? माफ़ कीजै कि बहुतों को इंसोमनिया हो गया है, पर दूर-दूर तक कोई राहत और हल नज़र नहीं आते।

प्रधानमंत्री जी, आपके आने से जो सबसे बड़ा नुक़सान इस जनतंत्र को हुआ है, वो ये कि पहली बार लोगों ने प्रधानमंत्री को गंभीरता से लेना छोड़ दिया है। ऐसा तो देवगौड़ा जिन्हें झूठा ही कमज़ोर प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया गया; के साथ भी नहीं था। आज लोग चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं, यह कोई अच्छी बात तो नहीं।

लोगों ने न्यायपालिका तक की मंशा पर संदेह करना शुरू कर दिया है। ऐसा मत कीजिए प्रधानमंत्री जी। सेक्युलरिज़म का मज़ाक उड़ाते-उड़ाते आपने ख़ुद को ही नहीं, प्रधानमंत्री नामक संस्था को मज़ाक का विषय बना दिया है।

यह सब बहुत दु: खी मन से आपके प्रति बिना किसी गुस्से के आज कह रहा हूँ। ख़ुद से नाराज़ हूँ।

एक तू ही नहीं जो मुझसे ख़फ़ा हो बैठा 
मैंने जो संग़ तराशा वो ख़ुदा हो बैठा। 
शुक्रिया ऐ मेरे क़ातिल ऐ मसीहा मेरे 
ज़हर जो तूने दिया था वो दवा हो बैठा।

भवदीय
जयन्तु जिज्ञासु 
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Tuesday, 5 December 2017

रवीश कुमार का लेख - न वह बाबरी मस्जिद थी और न बाबर ने मंदिर तोड़ा था / विजय शंकर सिंह

यह लेख किशोर कुणाल की अयोध्या पर लिखी पुस्तक Ayodhya Revisited के संदर्भ में हैं । यह अयोध्या के इतिहास और विवाद पर एक पठनीय पुस्तक है ।
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न वह बाबरी मस्जिद थी, न बाबर ने मंदिर तोड़ा था
>> रवीश कुमार

बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद से जुड़ा कोई व्यक्ति जो ख़ुद को सनातनी हिन्दू मानता हो और विवादित स्थान पर राम के मंदिर का निर्माण चाहता हो ताकि वो सरयू में स्नान कर वहां पूजापाठ कर सके, वह पांच छह साल के गहन अध्ययन के बाद, तमाम दस्तावेज़ों को जुटाते हुए अपने हाथों से 700 पन्ने की किताब लिखे और उस किताब में बाबर को अच्छा बताया जाए और कहा जाए कि जो मस्जिद गिराई गई वह बाबरी मस्जिद नहीं थी - तो उसे पढ़ते हुए आप तय नहीं कर पाते कि यह किताब बाबरी मस्जिद ध्वंस की सियासत पर तमाचा है या उन भोले लोगों के चेहरे पर जो नेताओं के दावों को इतिहास समझ लेते हैं।

Ayodhya Revisited नाम से किशोर कुणाल ने जो किताब लिखी है। किशोर कुणाल चाहते हैं कि वहां मंदिर बने लेकिन अयोध्या को लेकर जो ग़लत ऐतिहासिक व्याख्या हो रही है वह भी न हो। क्या एक किताब, चाहे वह सही ही क्यों न हो, दशकों तक बाबरी मस्जिद के नाम पर फैलाए गए ज़हर का असर कम कर सकती है? बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद सिर्फ मंदिर मस्जिद का विवाद नहीं है। इसके बहाने भारत के नागरिकों के एक बड़े हिस्से को बाबर से जोड़ कर मुल्क के प्रति उनकी निष्ठा और संवैधानिक दावेदारियों को खारिज करने का प्रयास किया गया।

अच्छा हुआ यह किताब किसी मार्क्सवादी इतिहासकार ने नहीं लिखी है। किशोर कुणाल ने लिखी है जिनकी सादगी, धार्मिकता और विद्वता पर विश्व हिन्दू परिषद और संघ परिवार के लोग भी संदेह नहीं कर सकते। इस किताब को बारीकी से पढ़ा जाना चाहिए। मसला जटिल है और इसकी इतिहासकारों की समीक्षा बाकी है। मैं आपके लिए सिर्फ सार रूप पेश कर रहा हूं। यह चेतावनी ज़रूरी है क्योंकि इस मसले पर कोई पढ़ना नहीं चाहता। सब लड़ना चाहते हैं।

Ayodhya Revisited का फार्वर्ड सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायधीश जस्टिस जे बी पटनायक ने लिखा है। इसके तीन चैप्टरों के मुखड़े इस विवाद के न जाने कितने मुखौटे उतार देते हैं। इसके तीसरे चैप्टर का मुखड़ा है Babur was not a religious fanatic, चौथे चैप्टर का मुखड़ा है Babur had no role either in the demolition of any temple at Ayodhya or in the construction of mosque और पांचवे चैप्टर का मुखड़ा Inscriptions on the structure were fake and fictitious।

मार्क्सवादी इतिहासकार स्व रामशरण शर्मा के विद्यार्थी रहे किशोर कुणाल का कहना है कि इस विवाद में इतिहास का बहुत नुकसान हुआ। वो इस ज़हरीले विवाद से अयोध्या के इतिहास को बचाना चाहते हैं। उनके अनुसार मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भी सही साक्ष्य नहीं रखे और उनकी सही व्याख्या नहीं की और मंदिर समर्थकों ने तो ख़ैर इतिहास को इतिहास ही नहीं समझा। झूठे तथ्यों को ऐतिहासिक बताने की दावेदारी करते रहे।
“मैं पिछले दो दशकों से ऐतिहासिक तथ्यों की झूठी और भ्रामक व्याख्या के कारण अयोध्या के वास्तविक इतिहास की मौत का मूक दर्शक बना हुआ हूं। नब्बे के दशक के शुरूआती वर्षों में हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक वार्ताकार के रूप में मैंने अपना कर्तव्य निष्ठा के साथ निभाया लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में चल रही सुनवाई के आख़िरी चरणों में मुझे लगा कि अयोध्या विवाद में हस्तक्षेप करना चाहिए और मैंने इस थीसीस को तैयार किया है। “

किशोर कुणाल ने अपनी किताब में बताया है कि कैसे विश्व हिन्दू परिषद के इतिहासकारों ने बहादुर शाह आलमगीर की अनाम बेटी की लिखित किताब बहादुर शाही को साक्ष्य बनाने का प्रयास किया। जबकि औरंगज़ेब के बेटे बहादुर शाह को कभी आलमगीर का ख़िताब ही नहीं मिला। बहादुर शाह की एक बेटी थी जो बहुत पहले मर चुकी थी। मिर्ज़ा जान इस किताब के बारे में दावा करता है कि उसने बहादुरशाही के कुछ अंश सुलेमान शिकोह के बेटे की लाइब्रेरी में रखी एक किताब से लिए हैं। कुणाल दावा करते हैं कि सुलेमान शिकोह का कोई बेटा ही नहीं था। मिर्जा जान ने 1855 में एक किताब लिखी है वो इतनी भड़काऊ थी कि उसे ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया था। कुणाल बराबरी से विश्व हिन्दू परिषद और मार्क्सवादी इतिहासकारों की गड़बड़ियों को उजागर करते हैं।

उन्होंने बताया है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों का दावा ग़लत था दशरथ जातक में राम सीता को भाई बहन बताया गया है। कुणाल साक्ष्यों को रखते हुए कहते हैं कि शुरूआती बौद्ध टेक्स्ट में राम को आदर के साथ याद किया गया है। कहीं अनादर नहीं हुआ है। उनका कहना है कि जातक कथाओं के गाथा हिस्से के बारीक अध्ययन से साबित होता है कि राम के बारे में कुछ आपत्तिजनक नहीं है। उन्होंने बी एन पांडे के कुछ दावों को भी चुनौती दी है। कुणाल ने मार्क्सवादी इतिहासकारों की आलोचना स्थापित इतिहासकार कहकर की है जिन्होंने असहमति या सत्य के के किसी भी दावे को स्वीकार नहीं किया।विश्व हिन्दू परिषद के इतिहासकारों के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा है कि मैं इन्हें राष्ट्रवादी या रूढ़ीवादी इतिहासकार की जगह उत्साही इतिहासकार कहना पसंद करता हूं। वैसे इस किताब में कार्ल मार्क्स का भी ज़िक्र है और वो भी अच्छे संदर्भ में !

कुणाल बताते हैं कि सोमनाथ में मंदिर तोड़ने और लूट पाट के बाद भी वहां के शैव पशुपतचार्या ने मस्जिद का निर्माण कराया, बल्कि आस पास दुकानें भी बनाईं ताकि व्यापार और हज के लिए जाने वाले मुसलमानों को दिक्कत न हो। वहीं वे कहते हैं कि कई पाठकों के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होगा कि 1949 में निर्जन मस्जिद में राम लला की मूर्ति रखने वाले बाबा अभिरामदासजी को 1955 में बाराबंकी के एक मुस्लिम ज़मींदार क़य्यूम किदवई ने 50 एकड़ ज़मीन दान दी थी। कुणाल बताते हैं कि इन विवादों से स्थानीय स्तर पर दोनों समुदायों में दूरी नहीं बढ़ी। वे एक दूसरे से अलग-थलग नहीं हुए।

“लोगों को जानकर हैरानी होगी कि तथाकथित बाबरी मस्जिद का 240 साल तक किसी भी टेक्स्ट यानी किताब में ज़िक्र नहीं आता है।” कुणाल बार बार ‘तथाकथित बाबरी मस्जिद’ कहते हैं जिसे हमारी राजनीतिक चेतना में बाबरी मस्जिद के नाम से ठूंस दिया गया है और जिसके नाम पर न जाने कितने लोग एक दूसरे को मार बैठे। उनका दावा है कि मस्जिद के भीतर जिस शिलालेख के मिलने का दावा किया जाता है वो फर्ज़ी है। इस बात को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस एस यू ख़ान ने भी स्वीकार किया था। इस मामले की क़ानूनी प्रक्रिया अंतिम रूप से पूरी नहीं हुई है ।

” उस तथाकथित बाबरी मस्जिद के निर्माण में बाबर की कोई भूमिका नहीं थी।” कुणाल की किताब का बाबर धर्मांध नहीं था। पूरे सल्तनत काल और मुगल काल के बड़े हिस्से में अयोध्या के तीन बड़े हिन्दू धार्मिक स्थल सुरक्षित रहे। विवादित स्थल पर मंदिर का तोड़ना औरंगजेब के समय हुआ न कि बाबर के समय। कुणाल के अनुसार 1813 साल में एक शिया धर्म गुरु ने शिलालेख में हेरफेर किया था जिसके अनुसार बाबर के कहने पर मीर बाक़ी ने ये मस्जिद बनाई थी। कुणाल इस शिलालेख को फर्ज़ी बताते हैं। वे इस किताब में हर बात के समर्थन में प्रमाण देते चलते हैं।

इस किताब को पढ़कर लग रहा है कि लेखक मंदिर निर्माण के हिन्दूवादी संगठनों के दोहरेपन से भी खिन्न हैं । उन्हें लगता है कि अनाप शनाप तथ्यों को इतिहास इसलिए बताया जा रहा है ताकि झगड़ा चलता रहे। इसलिए निर्दोष बाबर के ख़िलाफ़ उस अपराध के लिए दशकों तक नफ़रत फैलाई गई जो उसने की ही नहीं”, यह मामूली बात नहीं है । कुणाल बाबर को उदारवादी और बेख़ौफ़ योद्धा कहते हैं। हम आप जानते हैं कि मौजूदा राजनीति में बाबर का नाम लेते ही किस किस तरह की बातें ज़हन में उभर आती हैं। क्या वो संगठन और नेता कुणाल के इन दावों को पचा पायेंगे जिन्होंने ‘ बाबरी की औलादों’ कहते हुए अनगिनत भड़काऊ तकरीरें की थीं? बाबरी मस्जिद ध्वंस के पहले और बाद में ज़माने तक पानी नहीं ख़ून बहा है।

कुणाल ने अयोध्या का बड़ा ही दिलचस्प इतिहास लिखा है । पढ़ने लायक है । कुणाल के अयोध्या में सिर्फ राम नहीं हैं । रहीम भी हैं । अयोघ्या के इतिहास को बचाने और बाबर को निर्दोष बताने में कुणाल ने अपनी ज़िंदगी के कई साल अभिलेखागारों में लगा दिये मगर साक्ष्यों को तोड़ने मरोड़ने वाली राजनीति इस सनातनी रामानन्दी इतिहासकार की किताब को कैसे स्वीकार करेगी। उनकी इस किताब को पढ़ते हुए यही सोच रहा हूं कि कुणाल के अनुसार बाबर ने मंदिर नहीं तोड़ा, वह बाबरी मस्जिद नहीं थी; लेकिन अयोध्या के इतिहास को जिन लोगों ने ध्वस्त किया वे कौन थे, बल्कि वे कौन हैं। वे  आज कहां हैं और अयोध्या कहां है।
#रवीश_कुमार
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#vss

Saturday, 2 December 2017

एक कविता - लम्हे / विजय शंकर सिंह

लम्हे तो टुकड़े टुकड़े होते हैं,
आते और जाते ,
जाते और आते ,
उन्हें जोड़ना पड़ता है,
पुरानी फिल्मों की रील की तरह,
अलग अलग फ्रेम में खिंची
एक एक तस्वीर,को
जोड़ कर जैसे
चल पड़ता था कभी बाइस्कोप ।

गति ही ज़िन्दगी है,
लम्हों को जोड़ने का हुनर
आ जाय कभी तो
ज़िन्दगी एक दिलचस्प फ़िल्म के मानिंद
यूँ गुज़र जाती है कि
अफसोसनाक पल भी,
आ कर गुदगुदा देते है ।
आओ हम,
जोड़ना सीखें लम्हों को,
और जीना सीखें उन्हें !!

© विजय शंकर सिंह
01/12/2017.

Thursday, 30 November 2017

Ghalib - Aahang e Asad mein nahin / आहंग ए असद में नहीं - ग़ालिब - ग़ालिब पर बेदिल का प्रभाव / विजय शंकर सिंह

ग़ालिब - 45.
ग़ालिब पर बेदिल का प्रभाव.

आहंग ए असद में नहीं,
जुज़ नग़्मा ए बेदिल !!

Aahang e Asad mein nahin,
juz naghma e Bedil !!
- Ghalib.

ग़ालिब के गीतों में बेदिल के गीतों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.

बेदिल, उपनाम है उस शायर का जिसे ग़ालिब अपना मार्गदर्शक या प्रेरणाश्रोत मानते थे. बेदिल मूलतः फारसी के शायर थे उनका पूरा नाम मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल था. उनका समय 1642 से 1720 तक था. वे फारसी की सूफी परंपरा के शायर थे. फारसी के शायर होने के बावज़ूद भी उनके पुरखों की भाषा फारसी नहीं बल्कि तुर्की थी. वे तुर्क मुगल रक्त के थे और उनका जन्म अजीमाबाद जो अब पटना है , में हुआ था. मुग़ल दरबार के आश्रित होने के कारण इन्होंने दरी फारसी सीखी और उसी में अपना साहित्य रचा. कविताओं की 16 पुस्तकें इनके द्वारा लिखी गयी है. इनकी किताबों, तिलस्म ए हैरत, तूर ए मरफात, रुक़्क़ात ने मिर्ज़ा ग़ालिब को बहुत प्रेरित किया. धार्मिक परिवेश में पले बढे होने के बावज़ूद भी बेदिल उदार विचारधारा के थे. उनके उदार विचारों का तत्कालीन कट्टरपंथी जमात ने भी बहुत विरोध किया. ग़ालिब स्वीकार करते हैं कि सूफी और विराट दर्शन की परंपरा उन्हें बेदिल के साहित्य से ही मिली. ग़ालिब ही नहीं आधुनिक उर्दू के एक और महान शायर अल्लामा इक़बाल भी खुद को उनसे प्रभावित मानते थे.

बेदिल की रचनाएं गंभीर तो होती थीं पर एक प्रकार का चुलबुला पन उनमें था. उस समय के फारसी साहित्य के परम्परागत आलोचकों ने उस जटिल और शोखी भरे अर्थों से युक्त साहित्य की बहुत नहीं सराहा. यह साहित्य का एक नया आंदोलन था. गंभीरता के साथ एक प्रकार का चुलबुलापन जो ग़ालिब के शायरी में दीखता है वह बेदिल का ही प्रभाव. भारत से अधिक बेदिल ईरान और अफगानिस्तान में सराहे गए. अफगानिस्तान में तो उनके साहित्य पर शोध करने वालों को बेदिल शिनास ही कहा जाता है. यही नहीं मध्य एशिया में प्रचलित, इंडो पर्शियन संगीत कला में सबसे लोकप्रिय ग़ज़लें बेदिल की ही मानी जाती है. उनका देहांत दिल्ली में ही हुआ और उनकी मज़ार मथुरा रोड के पुराने किले के पास मेजर ध्यान चन्द नेशनल स्टेडियम के पास है.

© विजय शंकर सिंह

उदय प्रकाश की एक कविता - सत्ता / विजय शंकर सिंह

जो करेगा लगातार अपराध का विरोध
अपराधी सिद्ध कर दिया जायेगा

जो सोना चाहेगा वर्षों के बाद सिर्फ़ एक बार थक कर
उसे जगाये रखा जायेगा भविष्य भर

जो अपने रोग के लिए खोज़ने निकलेगा दवाई की दूकान
उसे लगा दी जायेगी किसी और रोग की सुई

जो चाहेगा हंसना बहुत सारे दुखों के बीच
उसके जीवन में भर दिये जायेंगे आंसू और आह

जो मांगेगा दुआ,
दिया जायेगा उसे शाप
सबसे सभ्य शब्दों को मिलेगी
सबसे असभ्य गालियां

जो करना चाहेगा प्यार
दी जायेंगी उसे नींद की गोलियां

जो बोलेगा सच
अफ़वाहों से घेर दिया जायेगा
जो होगा सबसे कमज़ोर और वध्य
बना दिया जायेगा संदिग्ध और डरावना

जो देखना चाहेगा काल का सारा प्रपंच
उसकी आंखें छीन ली जायेंगी
हुनरमंदों के हाथ
काट देंगी मशीनें

जो चाहेगा स्वतंत्रता
दिया जायेगा उसे आजीवन कारावास !
एक दिन लगेगा हर किसी को
नहीं है कोई अपना, कहीं आसपास !!

( उदय प्रकाश )
#vss

Monday, 27 November 2017

27 नवम्बर, पुण्यतिथि, वीपी सिंह - एक स्मरण / विजय शंकर सिंह

27 नवम्बर के ही दिन जब हम सब चिंतित हो कर टीवी के सामने चुपचाप आक्रोशित मुद्रा में मुंबई हमले का ज़ीवित प्रसारण देख रहे थे तो उसी समय टीवी पर एक पट्टी में वीपी सिंह के निधन का समाचार गुजरा था । किसी ने नोटिस लिया तो किसी ने उसे गुजर जाने दिया । निधन से अधिक महत्वपूर्ण खबर पाकिस्तान द्वारा मुम्बई पर हमले की, टीवी पर चल रही थी।

वीपी सिंह भारतीय राजनीति के ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपार बहुमत ही सत्ता की कसौटी नहीं होता है, का मिथक तोड़ा था । 1989 के जन मोर्चा के वे दिन जिन लोगों को याद होंगे वे यह ज़रूर बताएंगे कि वीपी सिंह का 1989 में उदय और उनकी लोकप्रियता के दम पर ही होने वाला आम चुनाव एक करिश्मा था । वीपी सिंह की सरकार बनी और उसका समर्थन किया था भाजपा और वामदलों ने। यह भी एक अजब राजनीति की गजब कहानी थी। लेकिन कुछ साथी नेताओं की महत्वाकांक्षा ने दक्षिण और वाम की बैसाखी पर चलती हुयी इस लंगड़ी सरकार को गिरा दिया ।

वीपी सिंह एक समय जितने लोकप्रिय हुए थे उतने ही यह अलोलप्रिय भी हुये । कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये मंडल कमीशन को लागू करने का निर्णय था । आग की तरह इस निर्णय का विरोध हुआ । अंततः मामला सुप्रीम कोर्ट गया और वहीं से अंतिम फैसला हुआ । इस फैसले के कारण अपने सजातीय समाज के भी यह निशाने पर रहे । आज इनकी पुण्यतिथि है। उनके साथ मेरे कुछ व्यक्तिगत संस्मरण भी हैं, जो फिर कभी साझा होंगे । वीपी सिंह के योगदान पर बहुत बहस होती रहती है । आगे भी होती रहेगी ।

संभवतः विरोधाभास उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। इलाहाबाद के पास मांडा के रहने वाले राजा मांडा के नाम से प्रसिद्ध वीपी सिंह ने  युवावस्था में ही अपनी रियासत की बहुत सारी जमीन उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से प्रेरित होकर दान कर दी थी।  देहरादून में अपनी करोड़ों अरबों की जमीन उन्होने ऐसे ही छोड़ दी उन लोगों के पास जो नाममात्र का किराया देकर वहाँ दुकानें आदि चलाते थे। वी.पी सिंह उन बिरले राजनेताओं में से रहे हैं जिन पर कभी धन के भ्रष्टाचार का आरोप कोई नहीं लगा सका । उन्हे सिर्फ एक राजनेता ही नहीं कहा जा सकता। श्री वी.पी सिंह में कई व्यक्तित्व दिखायी देते हैं और उन्हे सिर्फ किसी एक मुद्दे पर खारिज नहीं किया जा सकता। वे एक बेहतरीन कवि, लेखक, चित्रकार और फोटोग्राफर भी थे।

मंडल कमीशन लागू करने के सामाजिक और राजनीतिक निर्णय ने उनके व्यक्तित्व को बहुत हद तक भ्रम भरे बादलों के पीछे ढ़क दिया है। उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन राजनीतिक इतिहास लिखने वाले लोग करेंगे पर राजनीति से परे उनके अंदर के कलाकार पर तो लेखक और कलाकार समुदाय निगाह डाल ही सकता है। उनकी कविता में गहरे भाव रहे हैं। उन्होने तात्कालिक परिस्थितियों से उपजी कवितायें भी लिखीं जो काल से परे जाकर भी प्रभाव छोड़ने की माद्दा रखती हैं। कांग्रेस से इस्तीफा देते समय उन्होने यह कविता भी रची थी।

तुम मुझे क्या खरीदोगे
मैं बिल्कुल मुफ्त हूँ

उनकी कविता आधुनिक है, उसमें हास-परिहास, चुटीलापन भी है और व्यंग्य भी। उनकी कविता बहुअर्थी भी है। बानगी देखिये।

काश उसका दिल एक थर्मस होता
एक बार चाह भरी
गरम की गरम बनी रहती
पर कमबख्त यह केतली निकली।

वे नेताओं के राजनीतिक जीवन की सांझ के दिनों पर भी कविता लिखे बिना नहीं माने।

उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वहीं चिपका है
फटे इश्तेहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले
निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता।

कविता भारत के लगभग हर नेता के जीवन का सच उजागर कर देती है।

आदर्शवाद उनकी कविताओं में भी छलकता है और शायद इसी आदर्शवाद ने उन्हे राजनीति में कुछ खास निर्णय लेने के लिये प्रेरित किया होगा।

निम्नलिखित कविता में नेतृत्व को लेकर कितनी बड़ी बात वे कह गये हैं।

मैं और वक्त
काफिले के आगे-आगे चले
चौराहे पर …
मैं एक ओर मुड़ा
बाकी वक्त के साथ चले गये ।

प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी ने 1996 में एक लेख में उनके बारे में ये शब्द लिखे थे, जो पठनीय हैं ,
" सन् नब्बे के बाद हमारी राजनीति को बुनियादी रूप से किसी ने बदला है तो वीपी सिंह ने. कांग्रेस को किसी एक राजनेता ने निराधार किया है तो उसी में से निकले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने. लेकिन वे एक असाध्य रोग से दिन बचाते हुए रचनात्मक ऊर्जा में जी रहे हैं. जो मृत्यु से, कविता और चित्र से साक्षात्कार करके उसे अप्रासंगिक बनाता हुआ उस के पार जा रहा हो, उसकी सर्जनात्मक स्थितप्रज्ञता को भी थोड़ा समझिए. वह प्रणम्य । "

वे एक संवेदनशील और सहृदय व्यक्ति थे। वे संभवतः समय से आगे थे । आज उनकी पुण्यतिथि पर उनका विनम्र स्मरण और श्रद्गंजलि ।

© विजय शंकर सिंह